कहाँ है ईसा मसीह का 'जादुई प्याला'

  • 23 जून 2018
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दुनिया के हर धर्म से जुड़े तमाम क़िस्से-कहानियां होते हैं. पवित्र चीज़ें होती हैं. जिनको लेकर उस धर्म के अनुयायी क्रेज़ी होते हैं.

ऐसी ही धार्मिक किंवदंती है 'द होली ग्रेल' की. ईसाई धर्म से जुड़े क़िस्से कहानियों में आपने 'द लास्ट सपर' का ज़िक्र ज़रूर सुना होगा.

अगर नहीं तो इस वाक़ये की एक पेंटिग तो ज़रूर देखी होगी जिसे इटली के महान चित्रकार लिओनार्दो दा विंची ने बनाया था. इस पेंटिग में ईसा मसीह को अपने बारह धर्म प्रचारकों के साथ खाना खाते दिखाया गया है. इस पेंटिंग में खाने की थाली के साथ एक प्याला नज़र आता है. इस प्याले को 'होली ग्रेल' के नाम से जाना जाता है.

ईसाई धर्म की मान्यता के मुताबिक़ होली ग्रेल एक जादुई प्याला है, जिसके इस्तेमाल से इंसान अमर हो जाता है.

इस प्याले से बहुत से क़िस्से कहानियां और दावे जुड़े हैं. दुनिया के लगभग सभी प्राचीन चर्चों में ये प्याला रखा दिखाई दे जाएगा. और सभी उसके ओरिजनल होने का दावा करते हैं. अकेले यूरोप में ही क़रीब 200 जगहें दावा करती हैं कि उनके पास जो प्याला है वही असली होली ग्रेल है.

असली होली ग्रेल होने का दावा करने वाले तमाम ठिकानों में से एक है स्पेन का शहर वैलेंसिया. वैलेंसिया, स्पेन का तीसरा बड़ा शहर है.

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यहां आने पर आप को तरक़्क़ी के बावजूद वक़्त के ठहर जाने का एहसास होता है. शहर पुराना है. बाज़ार और गलियां पुरानी हैं. मगर यहीं पर आप को चर्च के ठीक बगल में लोग कॉफ़ी शॉप में गप लगाते भी दिख जाएंगे.

वैलेंसिया के ही एक बहुत पुराने चर्च में होली ग्रेल होने का दावा किया जाता है. इस चर्च का नाम है वैलेंसिया कैथेड्रल. यहां रखा एक प्याला जिसे स्पेनिश ज़बान में सांतो चैलिस कहते हैं, उसके होली ग्रेल यानी वो प्याला जिसे प्रभु यीशु ने इस्तेमाल किया था, होने का दावा सदियों से किया जाता रहा है.

आज भी दुनिया भर से श्रद्धालु इसके दर्शन के लिए वैलेंसिया आते हैं. यहां तक कि पोप जॉन पॉल द्वितीय और पोप बेनेडिक्ट सोलहवें ने धार्मिक आयोजनों में इस प्याले का इस्तेमाल किया.

होली ग्रेल का ज़िक्र बाइबिल में नहीं मिलता. ये तो बाद की धार्मिक कहानियों और लोक कथाओं का हिस्सा बना.

होली ग्रेल का सबसे पहले ज़िक्र आया था, ब्रिटेन के राजा किंग ऑर्थर से जुड़े क़िस्से-कहानियों में. राजा ऑर्थर और उनकी सेना की वीरता के क़िस्से बताने वाले महाकाव्यों में फ्रेंच कवियों ने होली ग्रेल का ज़िक्र किया था.

प्राचीन काल में फ्रांस के दो बड़े कवियों रॉबर्ट दी बोर्नो और शेरेटिन द ट्रॉय ने अपनी कविताओं में राजा आर्थर के ज़माने की कहानियों को और बढ़ा चढ़ाकर लिखा. द ट्रॉय ने इसका देग़ची या बड़ी डिश के तौर पर ज़िक्र किया है.

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श्रद्धालुओं के लिए होली ग्रेल यानी पवित्र प्याले का मज़हबी महत्व होगा लेकिन रिसर्चरों के लिए इसका साहित्यिक महत्व ज़्यादा है. स्पेन के वैलेंसिया में रखे प्याले वाले कैथेड्रल को 'ला केपिला देल सेंतो चैलिस' कहते हैं. मतलब पवित्र प्याले का चर्च.

यहां ये प्याला एक अलग कमरे में शीशे के फ़्रेम में बंद है. प्याले के दोनों तरफ़ सोने के बड़े हैंडल हैं. जिस स्टैंड पर ये प्याला रखा है उसकी पेंदी पर पन्ना और माणिक्य जैसे क़ीमती पत्थर जड़े हैं.

हालांकि फ़िल्मी कल्पनाओं में होली ग्रेल को एक साधारण से लकड़ी के प्याले के तौर पर दिखाया गया है. जैसे कि मशहूर हॉलीवुड सिरीज़ की फ़िल्म इंडियाना जोन्स एंड द होली ग्रेल में जिस पवित्र प्याले को दिखाया गया है वो लकड़ी का बना है. ऐसे में सोने और जवाहरात से जड़ा ये प्याला मन में सवाल पैदा करता है. चर्च के लोगों के मुताबिक़ इस स्टैंड पर जो छोटा सा कप रखा है वही असली होली ग्रेल है.

इसके हैंडल और पेंदी मध्यकालीन दस्तकारी का नमूना है, जिसे अब से कुछ समय पहले ही इसके साथ जोड़ा गया है.

माना जाता है कि प्रभु यीशु के आख़िरी भोज का वाक़या यरूशलम में हुआ था. तो फिर ये पवित्र प्याला स्पेन तक कैसे पहुंचा?

कहा जाता है कि दो हज़ार साल पहले रोम के पहले पोप सेंट पीटर इसे सबसे पहले यरूशलम से रोम लेकर आए थे और संत पीटर ने ही लोगों को बताया था कि यही होली ग्रेल है जिसका इस्तेमाल प्रभु यीशु ने अपने आख़िरी खाने के समय किया था.

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257 ईस्वी में जब रोम में राजा वलेरियन ने ईसाईयों को सताना शुरू किया तो इस पवित्र प्याले को स्पेन के शहर ह्यूस्का में सुरक्षित जगह पर भेज दिया गया. इस शहर में ये प्याला कुछ सदियों तक रहा. लेकिन आठवीं शताब्दी में जब यहां उमय्यद ख़लीफ़ाओं के हमले बढ़ने लगे, तो लूटपाट के डर से इसे उत्तरी स्पने के सेन जुआन दी ला पेना ईसाई मठ में सुरक्षित कर दिया गया.

सदियों तक ये पवित्र प्याला एक जगह से दूसरी जगह जाता रहा. लेकिन इसके सफ़र के शुरूआती एक हज़ार साल की कहानियों की तस्दीक़ करना मुश्किल है. इसके सफ़र से जुड़ी तमाम कहानियां सिर्फ़ मौखिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंची हैं. इसका कोई लिखित सबूत मौजूद नहीं है. फिर भी 1399 के एक दस्तावेज़ पर यक़ीन किया जा सकता है जब इसे स्पेनिश इलाक़े एरागोन के राजा किंग मार्टिन की समाधि का हिस्सा बनाया गया.

कैथेड्रल रिकॉर्ड के मुताबिक़ 1416 में जब अल्फ़ोंस ने गद्दी संभाली तो किंग मार्टिन के मक़बरा का तबादला वैलेंसिया कर दिया गया. प्याला भी साथ में यहां आ गया. बाद में इसे कैथेड्रल को सौंप दिया गया. हालांकि कई लड़ाइयों में इस पवित्र प्याले को लूटा गया. लेकिन 1939 में ये फिर से वैलेंसिया कैथेड्रल को सौंप दिया गया.

हालांकि जितने भी चर्च अपने पास ओरिजनल होली ग्रेल होने का दावा करते हैं उन सभी के पास अपने दावे को पुख़्ता बनाने के लिए ऐसी ही कहानियां हैं. लेकिन, वैलेंसिया के चर्च के होली ग्रेल के असल होने का दावा ज़्यादा मज़बूत लगता है.

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स्पेन के पुरातत्वविद एंतोनियो बेलट्रन ने इस पवित्र प्याले का अध्ययन किया था. इनके मुताबिक़ गोमेद पत्थर से बना ये कप पहली और दूसरी शताब्दी के दरमियान का है. और इसे मध्य एशिया में बनाया गया है.

2014 में दो इतिहासकारों ने 'किंग ऑफ़ द ग्रेल' नाम की एक किताब लिखी जिसमें उत्तरी स्पेन के चर्च बैसिलिकाऑफ़ सेन इसीडोरो ऑफ़ लिओन में असली होली ग्रेल होने का दावा किया है.

इन इतिहासकारों का ये दावा हाल में मिली प्राचीन मिस्री हस्तलिपि पर आधारित है. वैलेंसिया के चर्च की तरह इनके पास भी अपने तर्क के समर्थन में बहुत सी कहानियां हैं. लेकिन इन इतिहासकारों का दावा वैलेंसिया में होली ग्रेल या पवित्र प्याला होने की थ्योरी को नकारता है.

बहरहाल पवित्र प्याले को लेकर दावे और कहानियां तो बहुत हैं. लेकिन पुख्ता तौर पर असली पवित्र प्याला अभी भी रहस्य बना हुआ है. इस प्याले से ज़्यादा दिलचस्प हैं इससे जुड़ी कहानियां. असली होली ग्रेल कभी किसी को मिलेगा या नहीं, कहना मुश्किल है. लेकिन इसकी तलाश और इससे जुड़ी कहानियां हमेशा चलती रहेंगी.

(नोट- ये क्विन हर्जीताई की मूल स्टोरी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी के पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं)

( बीबीसी ट्रेवेल की इस स्टोरी को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

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