एक डिश के कारण साथ आए दो दुश्मन देश

  • सारा कील्टिंग
  • बीबीसी ट्रैवल
रेनडांग, मलेशिया, इंडोनेशिया

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कभी-कभी बड़े मसले छोटी बातों से सुलझ जाते हैं. कुछ ऐसा ही हुआ है साउथ ईस्ट एशिया में जहां एक पकवान के झगड़े ने दो धुर विरोधी देशों को एक साथ ला खड़ा किया है. ये सब कैसे हुआ ज़रा ये भी समझ लीजिए.

इसी साल अप्रैल महीने में ब्रिटेन में मास्टर शेफ़ शो में मलेशिया के एक उम्मीदवार ज़ालिहा क़ादिर ने चिकन रेनडांग नाम की डिश तैयार की. शो के जज ने इस डिश को ये कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि पकवान करारा नहीं बना.

रेनडांग डिश गोश्त से बनती है और इसे धीमी आंच पर नारियल और दूसरे मसालों के साथ पकाया जाता है. गोश्त इस हद तक गलाया जाता है कि वो मुंह में जाते ही पिघल जाए. ऐसे में शो के जज का ये कहना कि ये करारा नहीं है, अजीब बात थी.

शेफ़ के इस बयान के साथ ही सोशल मीडिया पर बाक़ायदा मुहिम छिड़ गई. #CrispyRendag और #Rendangate ट्विटर पर ट्रेंड करने लगे.

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डिश पर लड़ाई

मामला तब और गंभीर हो गया जब शो के दूसरे जज जॉन टोरोडे ने ये कहते हुए ट्वीट किया कि रेनडांग शायद इंडोनेशियन डिश है. इस ट्वीट के जवाब में जकार्ता के एक सोशल मीडिया यूज़र ग्रिफ़िन शॉनरी ने लिखा- क्या रेनडांग के नाम पर मलेशिया और इंडोनेशिया को लड़ाने की कोशिश की जा रही है. हम ऐसा नहीं होने देंगे. बल्कि हम एकजुट हो जाएंगे.

मलेशिया और इंडोनेशिया पड़ोसी देश हैं. लेकिन, ऐसा कम ही देखा गया है कि किसी मुद्दे पर इन दोनों में सहमति बनती हो. दोनों देशों के बीच तल्ख़ी और तनाव का लंबा इतिहास रहा है. लेकिन रेनडांग के मुद्दे पर दोनों देश एक हो गए हैं.

मूल रूप से ये डिश इंडोनेशिया की ही है लेकिन मलेशिया भी इस पर अपना दावा पेश करता है. कहा जाता है कि ये डिश इंडोनेशिया में पश्चिमी सुमात्रा के आदिवासियों मिनांगकाबुआ लोगों की है. वो इसे चिकन से नहीं बल्कि भैंस के गोश्त से बनाते हैं.

भैंस मिनांगकाबुआ जनजाति की संस्कृति का अहम हिस्सा है. इसे तैयार होने में क़रीब सात घंटे लगते हैं. कहा तो ये भी जाता है कि 'रेनडांग' शब्द भी 'मेरेनडांग' शब्द से आया है, जिसका मतलब है धीमी आंच पर पकाना.

लोगों के पलायन से पहुंची डिश

सुमात्रा यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफ़ेसेर गुस्ती अनन बताते हैं कि मिनांगकाबुआ लोगों के एक जगह से दूसरी जगह जाने की वजह से ही ये डिश इंडोनेशिया के पड़ोसी देशों में पहुंची. रिसर्च साबित करती है कि मिनांगकाबुआ लोग शादी करने के इरादे से भी पलायन करते थे.

पलायन, कारोबार के नए मौक़े और तजुर्बे की ग़र्ज़ से भी होता था. ये लोग सिंगापुर और मलेशिया पैदल या समंदर के रास्ते जाते थे. रेनडांग चूंकि लंबे समय तक रखा जा सकता था लिहाज़ा ये लोग अपने साथ केले के पत्तों में लपेट कर रेनडांग ही सफ़र में खाने के लिए साथ लेकर चलते थे.

प्रोफ़ेसर अनन कहते हैं कि ये पकवान तैयार करने की परंपरा कहां शुरू हुई सही तौर पर बता पाना मुश्किल है. लेकिन, एक बात दावे से कही जा सकती है कि मिनांगकाबुआ लोगों की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और सियासी जीवन पर भारत का गहरा असर है. प्राचीन काल से ही पूर्वी एशिया और दक्षिणी भारत में सांस्कृतिक लेन-देन होता आया है.

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कहा जाता है कि ये रेनडांग इंडोनेशिया में पश्चिमी सुमात्रा के आदिवासियों मिनांगकाबुआ लोगों की डिश है.

भारतीय खान-पान से प्रभावित पकवान

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दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

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पंद्रहवीं सदी तक इंडोनेशिया मसालों का गढ़ बन चुका था. मसालों का व्यापार करने यहां बड़े पैमाने पर भारत, चीन, अरब, और यूरोप के लोग आते थे. इन सभी देशों की संस्कृति और खान-पान का यहां असर पड़ा. दूसरी शताब्दी में भारतीय व्यापारी सोना और टिन की तलाश में इंडोनेशियन द्वीपों पर आते थे. इसीलिए माना जाता है कि इंडोनेशिया के पकवान भारतीय खान-पान से प्रभावित हैं.

प्रोफ़ेसर अनन कहते हैं कि रेनडेंग पकाते हुए जब नारियल का दूध और मसाले गाढ़े होने लगते हैं तो उसे 'कालियो' कहते हैं. लेकिन, मिलांगकाबुआ लोग इसे 'करी' कहते हैं. ये शब्द भारत के कढ़ी शब्द से आया है.

मलेशिया में अध-पका रेनडांग खाने का चलन है. यहां इसे शाही खाना भी कहा जाता है. इसे आम से ख़ास बनाने के लिए मसालों में थोड़ा फेरबदल किया जाता है. जैसे इसमें ताड़ की चीनी, और कसे हुए नारियल का दूध और तेल मिलाया जाता है, जो कि आम लोगों की पहुंच से बाहर है. इसे अमीर ही ख़रीद कर खा सकते हैं.

बहुत से जानकार इस डिश का संबंध मिनांगकाबुआ लोगों के सब्र, अक़लमंदी और मज़बूत इरादों वाले जीवन दर्शन से जोड़कर भी देखते हैं.

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ख़ास मौकों की डिश

रेनडांग रोज़मर्रा का खाना नहीं है इसे शादी, त्यौहार या किसी नेता के राज तिलक जैसे मौक़े पर ही बनाया जाता है. ये पकवान लोगों के दिल के बहुत क़रीब है. सिंगापुर में मलेशियन रेस्टोरेंट चलाने वाले दो भाई हज़मी और आरिफ़ ज़ीन कहते हैं कि सिंगापुर में लोग इसे पारंपरिक तरीक़े से चावल के साथा खाना पसंद करते हैं.

ज़ीन बंधुओं ने रेनडांग बनाने का तरीक़ा अपनी दादी से सीखा था, जो 1940 में सिंगापुर पहुंची थीं. यहां उन्होंने सड़क किनारे अपने इलाक़े के पारंपरिक खाने बनाकर बेचने शुरू किए थे. बाद में उन्होंने यहां अपना रेस्टोरेंट खोल लिया जिसका नाम उन्होंने 'सब्र मिनानती' रखा. जिसका मतलब है 'सब्र से इंतज़ार कीजिए'.

दरअसल इनकी दुकान पर खाने वालों की भीड़ जमा हो जाती थी और सब को एक वक़्त संभालना मुश्किल होता था, इसीलिए उन्होंने अपने रेस्टोरेंट का नाम 'सब्र मिनानती' रखा.

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रेनडांग के अलग रूप

रेनडांग को एशिया के अलग-अलग देशों में कई दूसरे पकवानों के साथ मिलाकर भी खाया जाता है. हालांकि, जो लोग पारंपरिक तरीक़े से इसे तैयार करते हैं उनके मुताबिक़ ऐसा करने वाले इस पकवाने को विशुद्ध करते हैं.

इसमें कोई शक नहीं है कि ये पकवान 'नुसनतारा' इलाक़ों से ही दूसरे देशों तक फ़ैला है. नुसनतारा मलय-इंडोनेशियन शब्दावली है, जो द्वीपसमूह वाले देशों जैसे मलेशिया, सिंगापुर और ब्रुनेई के लिए इस्तेमाल होता है. अलग-अलग इलाकों में लोग मसालों में थोड़ा फेरबदल करके इसे अपने-अपने तरीक़े से बनाते हैं.

मिसाल के लिए सिंगापुर की जूलिया अदनान पिछले 46 साल से भैंस के गोश्त वाला रेनडांग तैयार कर रही हैं. इसके लिए वो ख़ास तरह की देग़ची का इस्तेमाल करती है. इनके मुताबिक़ किसी और बर्तन में पकाने से इसका ज़ायक़ा बदल जाएगा.

जूलिया के रेनडांग बनाने का तरीक़ा बहुत सादा है. वो इसे बनाने के लिए अपने गांव के पारंपरिक मसालों का ही इस्तेमाल करती हैं. जबकि ज़ीन बंधुओं का रेनडांग बनाने का तरीक़ा थोड़ा अलग है. वो हल्दी के ताज़े पत्ते, सूखी और ताज़ा दोनों तरह की मिर्च का इस्तेमाल करते हैं.

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मलेशिया में रेनडांग रमज़ान के बाद की दावत के दौरान बनाया जाता है.

यूनिवर्सिटी पुत्रा मलेशिया के प्रोफ़ेसर डॉ. शाहरीम अब करीम का कहना है कि मलेशिया के लोगों ने इस डिश को अपना साबित करने के लिए इसमें कई तरह के बदलाव कर लिए हैं. मलेशिया में इसे राष्ट्रीय पकवान माना जाता है.

खुशी के हरेक मौक़े और सरकारी कार्यक्रमों में रेनडांग ही परोसा जाता है. चिकन रेनडांग लोग रोज़मर्रा में खाते हैं लेकिन बीफ़ रेनडांग ख़ास मौक़ों पर ही बनता है. विरासत के तौर पर इसे बनाने का तरीक़ा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचा है.

बहरहाल इस विवाद के बाद जिस तरह इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर के लोग इकट्ठा हुए हैं, उससे साफ़ है कि कोई पकवान तमाम देशों को जोड़ने का काम भी कर सकता है.

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