भारत ने दुनिया को शून्य देकर यूं की थी क्रांति

  • 12 अगस्त 2018
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मध्य भारत का ग्वालियर शहर बहुत घना बसा हुआ है. इसी शहर के बीच स्थित पठारी इलाक़े में एक क़िला बड़ी शान-ओ-शौक़त के साथ सिर उठाए खड़ा दिखता है.

आठवीं सदी में बना ग्वालियर का क़िला देश के सबसे बड़े क़िलों में से एक है. इस क़िले के कंगूरों, मीनारों, दीवारों की महीन चित्रकारियों और गुम्बदों से घिरा एक छोटा सा मंदिर है.

नौवीं सदी में बना ये मंदिर चट्टान को काटकर बनाया गया है.

इसे चतुर्भुज मंदिर कहा जाता है. ये भारत के दूसरे प्राचीन मंदिरों की ही तरह की बनावट वाला है. लेकिन, इसकी एक ख़ूबी ऐसी है जो चतुर्भुज मंदिर को अनूठा बनाती है.

ये है ज़ीरो का ग्राउंड ज़ीरो. पूरी दुनिया में ये मंदिर वो सब से पुरानी जगह है, जहाँ पर शून्य उकेरा हुआ मिला है. मंदिर में नौवीं सदी के एक शिलालेख में 270 अंकित है. ये दुनिया का सबसे पुराना शून्य है.

गणित और विज्ञान के लिहाज़ से शून्य का आविष्कार बहुत बड़ी कामयाबी थी. आज की तारीख़ में दुनिया की हर तरक़्क़ी की बुनियाद इसी शून्य पर टिकी हुई है.

गणित हो, प्रमेय हो, भौतिकी हो या इंजीनियरिंग, आज के दौर की हर तकनीक की शुरुआत इसी शून्य से मुमकिन हुई है.

लेकिन, भारतीय संस्कृति में ऐसी क्या ख़ास बात है, जिसने इतने महत्वपूर्ण आविष्कार को जन्म दिया, जो आधुनिक भारत और आधुनिक दुनिया की बुनियाद बना?

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शून्य से शून्य तक

मुझे एक भारतीय पौराणिक विशेषज्ञ देवदत्त पटनायक का सुनाया हुआ एक क़िस्सा याद आता है. ये क़िस्सा पटनायक ने टेड टाक्स के दौरान सुनाया था, जो सिकंदर महान से जुड़ा हुआ है.

जब दुनिया जीतते हुए सिकंदर भारत पहुंचा, तो उसकी मुलाक़ात एक नागा साधु से हुई. पूरी तरह से नग्न वो साधु बहुत अक़्लमंद इंसान था. वो शायद एक योगी था. वो योगी एक चट्टा पर बैठा हुआ आसमान को ताक रहा था.

सिकंदर महान ने उस योगी से पूछा, "आप क्या कर रहे हैं?"

योगी ने सिकंदर को जवाब दिया, "मैं शून्य का तजुर्बा कर रहा हूं. तुम क्या कर रहे हो?"

सिकंदर ने कहा कि, "मैं दुनिया जीत रहा हूं."

इसके बाद वो दोनों हंसने लगे. शायद वो दोनों मन में सोच रहे थे कि सामने वाला शख़्स कितना बड़ा मूर्ख है. अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर रहा है.

ये क़िस्सा ग्वालियर के क़िले में स्थित मंदिर में शून्य अंक उकेरे जाने से बहुत पहले का है.

लेकिन उस नागा साधु का शून्य में ध्यान लगाने का सीधा ताल्लुक़ ज़ीरो के आविष्कार से है.

दूसरी सभ्यताओं के बरक्स, भारतीय संस्कृति में शून्य को लेकर लंबा-चौड़ा दर्शन मौजूद है. भारतीय संस्कृति में ध्यान और योग जैसे तरीक़ों से मस्तिष्क को ख़ाली करने का तरीक़ा निकाला गया.

हिंदू और बौद्ध, दोनों ही धर्मों में शून्य के सिद्धांत और इससे जुड़ी शिक्षाएं मिलती हैं.

नीदरलैंड के ज़रओरिगइंडिया फ़ाउंडेशन के डॉक्टर पीटर गोबेट्स ज़ीरो प्रोजेक्ट से जुड़े हुए हैं. ये फाउंडेशन शून्य की उत्पत्ति से जुड़ी हुई रिसर्च कर रही है.

उन्होंने एक लेख में शून्य के आविष्कार को लेकर लिखा है कि, "गणित के शून्य की उत्पत्ति बौद्ध दर्शन के शून्यता के सिद्धांत से हुई मालूम होती है. इस सिद्धांत के मुताबिक़ इंसान के मस्तिष्क को विचारों और प्रभावों से मुक्त किया जाता है."

यही नहीं प्राचीन काल से ही भारत में गणित को लेकर ज़बरदस्त दिलचस्पी रही है. प्राचीन काल के भारतीय गणितज्ञ बड़े-बड़े अंकों में गणनाएं करते थे. ये गणनाएं अरबों-खरबों से लेकर पद्म और शंख तक जाती थीं.

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क्या प्राचीन भारत का हिंदू वाक़ई सहिष्णु था?

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जबकि प्राचीन ग्रीक सभ्यता के लोग दस हज़ार की संख्या से आगे नहीं बढ़ सके. प्राचीन भारतीय दर्शन में अनंत की गणना भी अलग थी.

हिंदू ज्योतिषी और गणितज्ञ आर्यभट्ट (जन्म- ईस्वी 476) और ब्रह्मगुप्त (जन्म- ईस्वी 598) के बारे में मशहूर है कि उन्होंने ही आधुनिक दशमलव सिस्टम और ज़ीरो के इस्तेमाल की बुनियाद रखी.

हालांकि ग्वालियर के क़िले में स्थित मंदिर में अंकित शून्य को दुनिया में ज़ीरो की सबसे पुरानी मिसाल कहा जाता है. लेकिन, तक्षशिला से जुड़ी प्राचीन भारतीय बख़्शाली पांडुलिपि में भी शून्य दर्ज हुआ पाया गया है.

इस पांडुलिपि के बारे में हाल ही में पता चला है कि ये तीसरी या चौथी सदी की रचना है. अब इसे ही दुनिया में शून्य की सबसे पुरानी मिसाल माना जाता है.

ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी में गणित के प्रोफ़ेसर मार्कस ड्यू सोटोय ने यूनिवर्सिटी की वेबसाइट में लिखा है कि, "शून्य की एक अंक के तौर पर कल्पना, गणित के इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धि है. इसकी शुरुआत हम बख्शाली की पांडुलिपि में दर्ज बिंदु से देखते हैं. आज हमें ये पता है कि भारत के प्राचीन गणितज्ञों ने तीसरी सदी में ही गणित के विचार का ऐसा बीज रोपा था, जो आज आधुनिक दुनिया की बुनियाद है. इन खोजों से साफ़ है कि प्राचीन काल में भारतीय उप-महाद्वीप में गणित की विधा ख़ूब फल-फूल रही थी."

ज़ीरो का आविष्कार भारत के सिवा किसी और देश में क्यों नहीं हुआ, इसकी भी बहुत दिलचस्प वजहें हैं.

एक विचार तो ये है कि बहुत सी सभ्यताओं में शून्य को लेकर ख़यालात अच्छे नहीं थे. जैसे कि यूरोप में ईसाइयत के शुरुआती दिनों में धर्मगुरुओं ने ज़ीरो के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी.

उनका मानना था कि ईश्वर ही सब कुछ है, ऐसे में जो अंक शून्यता की नुमाइंदगी करे, वो शैतानी होता है.

तो भारत के आध्यात्मिक ज्ञान का शून्य के आविष्कार से गहरा नाता है. अध्यात्म ने ही ध्यान को जन्म दिया, जिससे आगे चल कर ज़ीरो का आविष्कार हुआ.

प्राचीन भारत के एक और ज्ञान का आधुनिक दुनिया से गहरा ताल्लुक़ है. ये हैं जुड़वां नंबर या बाइनरी नंबर.

शून्य की परिकल्पना जुड़वां अंकों की बुनियाद है. और ये बाइनरी नंबर ही आधुनिक कंप्यूटर की आधारशिला हैं.

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भारतीय सिलिकॉन वैली

जब आप बेंगलुरु के केम्पेगौड़ा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से निकलकर शहर की तरफ़ बढ़ते हैं, तो आप को ग्रामीण इलाक़ों में फैले हुए बड़ी-बड़ी आईटी कंपनियों के कैम्पस दिखते हैं.

क़रीब 37 किलोमीटर लंबे इस सफ़र के दौरान आप को गूगल, एप्पल, ओरेकल, माइक्रोसॉफ्ट, एडोब, सैमसंग और अमेज़न जैसी कंपनियों के कैम्पस दिखते हैं.

इसके अलावा देसी कंपनियों जैसे इन्फोसिस और विप्रो के कैम्पस भी देखने को मिलते हैं.

ये शानदार एयरपोर्ट और चमकीले साइनबोर्ड परिवर्तन की सबसे बड़ी निशानी हैं. बेंगलुरु में आईटी इंडस्ट्री के आने से पहले इसे बैंगलोर कहा जाता था.

ये बागीचों का शहर भी कहा जाता था. आज इसे भारत की सिलिकॉन वैली कहा जाता है.

इसकी शुरुआत 1970 के दशक में इलेक्ट्रॉनिक सिटी नाम के औद्योगिक पार्क की स्थापना से हुई थी. धीरे-धीरे पूरे कर्नाटक में इलेक्ट्रॉनिक्स के उद्योग का विस्तार हो गया.

आज बेंगलुरु शहर में कई आईटी पार्क हैं. भारत के कुल आईटी उद्योग का 40 फ़ीसद यहीं पर स्थित है. हो सकता है कि आगे चलकर बेंगलुरु, सिलिकॉन वैली को भी पीछे छोड़ दे.

एक अनुमान के मुताबिक़ 2020 तक बेंगलुरु दुनिया का सबसे बड़ा आईटी हब बन जाएगा. यहाँ पर बीस लाख आईटी प्रोफ़ेशनल, 60 लाख आईटी इंडस्ट्री से जुड़ी दूसरी नौकरियां हैं, और यहाँ से 80 अरब डॉलर का आईटी एक्सपोर्ट होता है.

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ये सब जुड़वां अंकों की वजह से ही मुमकिन हुआ है.

आज के कंप्यूटर दो अवस्थाओं के सिद्धांत पर काम करते हैं. ऑन और ऑफ़. ऑन का मतलब 1 है, तो ऑफ का मतलब 0.

अमरीका की ओक्लाहोमा स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर सिद्धार्थ काक बताते हैं कि, 'जुड़वां अंकों का आविष्कार ईसा से दो से तीन सदी पहले के भारतीय संगीतज्ञ पिंगला ने किया था. इसका इस्तेमाल संगीत की धुनें तैयार करने के लिए किया जाता था.'

लालबाग़ बॉटैनिकल गार्डेन, बेंगलुरु का सांस्कृतिक और भौगोलिक केंद्र है. पुराने बैंगलोर का प्रतीक ये बाग़, बैंगलोर आने वाले हर शख़्स को देखने की सलाह दी जाती थी.

इसे 1760 में तैयार किया गया था. बाद में इसमें दूसरे हिस्से जुड़ते चले गए. ये विक्टोरिया युग की निशानी है. लाल बाग़ में गुलाब की 150 किस्में पाई जाती हैं.

लंदन के क्रिस्टल पैलेस की तर्ज पर यहाँ कांच से बना एक पविलियन है. लाल बाग एशिया के सबसे तेज़ी से बढ़ रहे शहर की धरोहर है.

ये उन दिनों की निशानी है, जब अंग्रेज़ों के ज़माने में बैंगलोर रिटायर्ड ब्रिटिश अधिकारियों का अड्डा हुआ करता था.

अंग्रेज़ों ने यहाँ शांत कोठियां बनवाईं, जिनमें बड़े-बड़े बागीचे हुआ करते थे. जिनमें ये अंग्रेज़ अफसर अपने रिटायरमेंट के दिन बिताते थे.

लेकिन, आज शहर के बुनियादी ढांचे के विकास की सख्त ज़रूरत है. इसके बोझ तले पुराना बेंगलुरु गुम होता जा रहा है.

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आंकड़े बताते हैं कि बैंगलोर शहर 1991 से 2001 के दशक में 38 फ़ीसद सालाना की दर से विकसित हुआ. आज ये दुनिया का 18वां सबसे ज़्यादा आबादी वाला शहर है.

आज यहाँ सवा करोड़ से ज़्यादा लोग रहते हैं. यहाँ का ट्रैफिक भारत में सबसे ख़राब कहा जाता है. यहाँ के बुनियादी ढांचे का विकास, शहर के विकास के साथ क़दमताल मिलाकर नहीं चल सका है.

जो शोर-गुल, जाम और भीड़ भारत के तमाम शहरों की निशानी है, वो बेंगलुरु में उरूज पर पहुंचती मालूम होती है. यहाँ तीन किलोमीटर का सफ़र तय करने में आप को एक घंटा लग सकता है.

फिर भी इस शहर के बाशिंदे अपनी ज़िंदगी मज़े से गुज़ारते हैं. वो हाई-टेक कैम्पस के क़रीब रहते हैं, स्टार्ट-अप शुरू करते हैं. सॉफ्टवेयर डिज़ाइन करते हैं.

फिर वो दुनिया भर को अपने आईटी उत्पादों का निर्यात करते हैं. इस बात का अंदाज़ा लगाना मुश्किल है कि बेंगलुरु मे कितने कंप्यूटर चिप और सॉफ्टवेयर प्रोग्राम बने और दुनिया के तमाम हिस्सों को भेजे गए.

इससे भी अहम इस बात की कल्पना करना है कि कितने जुड़वां नंबरों की वजह से ये मुमकिन हुआ.

मत भूलिये कि इन सब की शुरुआत भारत से ही हुई थी... शून्य से.

(नोटः मेरेलिन वॉर्ड की ये स्टोरी बीबीसी ट्रेवल की 'पलेसिस दैट चेंज्ड द वर्ल्ड' नामक सिरीज़ का हिस्सा है. ये मूल स्टोरी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी के पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं)

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी ट्रैवल पर उपलब्ध है.)

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