वो देश जहां हर घर में कठपुतलियां लटकी होती हैं, पर क्यों?

  • 29 अगस्त 2018
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जो काम कभी इंसान या बड़ी-बड़ी क्रांतियां नहीं कर पातीं, कुछ बेजान चीजें कर जाती है. हो सकता है सुनने में ये थोड़ा अजीब लगे, लेकिन यूरोप के देश चेक रिपब्लिक के बारे में ये बात सौ फ़ीसदी खरी है.

कठपुतलियां, ना सिर्फ़ आज के चेक रिपब्लिक की पहचान हैं, बल्कि ये ख़ुद में कई सदियों का इतिहास समेटे हैं. आपको जानकर हैरानी होगी कि इन कठपुतलियों की वजह से ही चेक लोग आज अपनी पारंपरिक ज़बान बोल पा रहे हैं. इन कठपुतलियों ने चेक संस्कृति और भाषा को संजोने में अहम किरदार निभाया है.

17वीं सदी में जब बोहेमिया राज्य पर ऑस्ट्रिया के हैब्सबर्ग राजवंश का राज था, तो उस दौर में चेक ज़बान पूरी तरह ग़ायब हो गई थी. ये वो दौर था जब ईसाई मज़हब प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक दो हिस्सों में बंट गया था. उनके बीच वर्चस्व की लड़ाई जारी थी.

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इस दौर में बेला होरा की लड़ाई हुई. इसे व्हाइट माउंटेन की लड़ाई भी कहा जाता है. ये माउंटेन मौजूदा चेक रिपब्लिक में है. इस लड़ाई में प्रोटेस्टेंट बोहेमिया को कैथोलिकों के हाथों मुंह की खानी पड़ी थी.

चेक रिपब्लिक के इतिहास में ये लड़ाई सबसे ज़्यादा अहमियत वाली है. इस लड़ाई के बाद ही यूरोप दो हिस्सों में बंट गया था और कई तरह की सियासी, सामाजिक और सांस्कृतिक सरहदें बन गई थीं.

साथ ही चेक गणराज्य पर ऑस्ट्रिया के हैब्सबर्ग राजवंश की हुकूमत क़ायम हो गई थी. ये लड़ाई क़रीब 30 साल तक चली. आख़िर में चेक प्रोटेस्टेंट को ऑस्ट्रिया के कैथोलिक ने मात दे दी.

इस जंग में जो चीज़ सबसे ज़्यादा दांव पर लगी थी, वो थी चेक लोगों की ज़बान, जो उनकी पहचान थी. चेक गणराज्य के नए शासक फ़र्डिनेंड द्वितीय ने चेक लोगों पर जर्मन भाषा थोप दी थी. उसे ग़ैर-कैथोलिक लोग बिल्कुल पसंद नहीं थे. वो उन्हें अपनी पहचान के लिए ख़तरा मानते थे.

शुरूआत में बुद्धिजीवी वर्ग ने इसका विरोध किया था. लेकिन, बाद में उन्हें भी शासक वर्ग की भाषा ख़ुद पर लादनी पड़ी. यहां तक कि कलाकारों को भी सिर्फ़ जर्मन भाषा में ही अभिव्यक्ति की इजाज़त दी गई.

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सिर्फ़ कठपुतलियों को ही चेक भाषा बोलने की इजाज़त

ऐसे में चेक ज़बान, भाषा से महज़ एक बोली में सिमट कर रह गई, जिसे कुछ ही लोग बोलते थे. 1600 में जब प्रोटेस्टेंट कोर्ट ने चेक राजधानी प्राग को छोड़ा तो ये देश और दो सौ साल पीछे चला गया.

जिन लोगों को अपनी ज़बान से ख़ास लगाव था, उन्होंने इसे बचाने के लिए एक नायाब तरीक़ा ढूंढ निकाला. उन्होंने अपना विरोध जताने के लिए कठपुतली का इस्तेमाल किया. दरअसल फ़र्डिनेंड द्वितीय के ज़माने में सिर्फ़ कठपुतलियों को ही चेक भाषा बोलने की इजाज़त थी.

17वीं सदी में चेक रिपब्लिक के नक़्क़ाश चर्च के लिए कुर्सियों पर नक़्क़ाशी करते थे. लेकिन इंसानी चेहरे उकेरने में माहिर नहीं थे. लिहाज़ा उन्होंने अजीब तरह के चेहरे बनाने शुरू कर दिए और इनके माध्यम से वो अपनी भाषा को व्यक्त करते थे.

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हालांकि ऐसे मुठ्ठी भर लोगों की कोशिशों से ख़त्म होती एक ज़बान का वजूद बचा पाना दूर की कौड़ी लगता था. लेकिन इन लोगों की ये कोशिश कठपुतलियों की डोरियों में ऐसी बंधी कि विरासत बनकर कई नस्लों तक चलती रही. यही वजह है इन कठपुतलियों की चेक लोगों के दिलों में ख़ास जगह है.

चेक गणराज्य की राजधानी प्राग के बाज़ारों में लगभग हरेक दुकान में कठपुतलियां लटकी नज़र आ जाएंगी. ज़्यादातर कठपुतलियां आज भी लकड़ी की बनाई जाती हैं. इन कठपुतलियों में राजा-रानी, चुड़ैल, किसान, जानवर सभी क़िस्म की मिल जाएंगी.

फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि एक दौर में ये लोगों की ज़बान और उनके जज़्बात का इज़हार करती थीं और आज ये महज़ सजावटी सामान और बच्चों के खेलने भर के लिए रह गई हैं. आज भी गली कूचों में पपेट शो होते हैं. प्राग के नेशनल मैरिओनेट थियेटर में बड़े-बड़े लाइव पपेट शो का आयोजन किया जाता है. स्थानीय लोगों के साथ-साथ टूरिस्ट भी ये शो देखने आते हैं.

इन पपेट और कलाकारों की वजह से ही चेक गणराज्य की नौजवान पीढ़ी आज भी अपनी ज़बान बोल पा रही है. वो ज़बान जो सदियों पहले ख़ात्मे के कगार पर पहुंच चुकी थी.

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