वो समुदाय जिसकी मेहमाननवाज़ी ने विफल किया अरब विद्रोह

  • 11 सितंबर 2018
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मैं अचानक थमाए गए बकरी के बच्चे को संभाल ही रही थी कि इसे देने वाली बच्ची ज़ोर से चीखी-गिफ़्ट! फिर वो मेरे लिए तोहफ़ा लाने अपनी रिहाइश की तरफ़ भागी. मुझे लगा वो बकरी के बच्चे को ही मुझे तोहफ़े में दे रही थी.

लेकिन, 11 बरस की मुना अपने परिवार के तंबू में गई और वहां से पांव में लगाने वाले लोशन की बोतल ले कर आई. उसने मुझे बोतल देते हुए कहा-ये है तुम्हारा तोहफ़ा. उसकी दो साल बड़ी बहन भी भागते हुए झोपड़े के अंदर गई और प्लास्टिक का एक ब्रेसलेट मुझे गिफ़्ट के तौर पर देने के लिए ले आई.

ये दोनों ही लड़कियां मेरा इनकार नहीं सुनना चाहती थीं. फिर मैं ने भी उन्हें लिप लोशन की एक डिब्बी तोहफ़े में दी. दोनों बहुत ख़ुश हुईं.

मैंने उन बच्चियों के साथ झोपड़ी में ढेर सारी बातें कीं. दोनों मुझे अपनी बनाई ड्रॉइंग दिखा रही थीं. इस दौरान उनकी शर्मीली मां हमें चाय पर चाय पिलाती रही, जो लकड़ी से जलने वाले चूल्हे पर पक रही थी. बाहर मेरा गाइड इन बच्चियों के पिता से बात कर रहा था.

जॉर्डन में रहने वाले कुछ ख़ास लोग

जॉर्डन में घूमते हुए पहली बार मुझे ऐसा लगा कि जो देखने मैं आई थी, वो मुझे मिल गया है.

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ये बच्चियां अरब देशों के मशहूर बद्दू क़बीले की सदस्य हैं. ख़ानाबदोश इस क़बीले के कुछ लोगों ने जॉर्डन की वादी रम में ठिकाना बना रखा है.

यहां आने से पहले मुझे लग रहा था कि मेरा जॉर्डन घूमने आने का फ़ैसला ग़लत था. लेकिन जब मैं बद्दू समुदाय के लोगों से मिली, तो मेरे अंदर से पछतावे का एहसास जाता रहा.

जबकि जॉर्डन के लाल सागर के किनारे स्थित शहर अक़ाबा में मेरे साथ इतनी बदसलूकी हुई थी कि मैं ख़ुद को होटल में ही क़ैद करने के बारे में सोच रही थी.

लेकिन वादी रम आने पर मुझे महसूस हुआ कि ये जगह बहुत अच्छी है. यहां अरब दुनिया के मशहूर ख़ानाबदोश बद्दू क़बीले के लोगों की काफ़ी आबादी है.

तकनीकी तरक़्क़ी के साथ दुनिया भर के लोगों के जीवन स्तर में बड़ा बदलाव हुआ है. यहां तक कि जंगलों में रहने वालों ने भी ज़िंदगी गुज़ारने का तरीक़ा बदला है. लेकिन क़बीलाई समुदाय बद्दू के लोगों में ज़र्रा बराबर भी बदलाव नहीं आया. वो आज भी ख़ानाबदोशी की ज़िंदगी गुज़ारते हैं.

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Image caption जॉर्डन का वादी रम क्षेत्र

जॉर्डन की दक्षिणी सरहद पर बसा वादी रम नाम का छोटा सा गांव ऐसे ही ख़ानाबदोशों से आबाद है. ये गांव अपनी दो ख़ूबियों के लिए जाना जाता है.

लज़ीज़ खाने और यहां की मेहमाननवाज़ी. इसके अलावा सफ़ेद और लाल मिट्टी वाली लहरदार पहाड़ियां और चट्टानें इसकी पहचान हैं. दुनिया भर के सैलानी यहां घूमने आते हैं.

वादी रम जॉर्डन की सऊदी अरब से लगती सीमा पर स्थित है. यहां पर बद्दू क़बीले के लोग रहते हैं. इस समुदाय को दुनिया से रूबरू कराने का श्रेय मशहूर ब्रिटिश नागरिक टी.ई लॉरेंस को जाता है.

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उन्होंने बद्दू लोगों का रहन-सहन इस हद तक अपनाया था कि यहां के लोग उन्हें लॉरेंस ऑफ अरेबिया कहने लगे. लॉरेंस के अरब मुल्कों से प्रेम को लेकर हॉलीवुड में इसी नाम से फिल्म भी बनी थी.

मेहमाननवाज़ी ने विफ़ल किया विद्रोह

लॉरेंस ने यहां की मेहमाननवाज़ी का बखान करते हुए लिखा है कि बद्दू लोगों की इस अदा ने अरबों के विद्रोह को नाकाम बना दिया था.

क़िस्सा मशहूर है कि जब अरब, ओटोमान साम्राज्य से बाग़ी हुए तो उन्होंने हर तुर्क को देखते ही मारने की ठानी.

इसी दौर में में इस इलाक़े से कुछ तुर्की अफ़सर भी गुज़रे. कुछ लोगों का कहना था कि इन्हें मार देना चाहिए. जबकि बद्दू लोग अपने उसूलों के पाबंद थे. उनका मानना था कि तुर्की अफ़सर उनके मेहमान हैं. और उन्होंने अपने मेहमानों की ख़ूब ख़ातिर की भी. बद्दू लोग जब तक किसी से ख़तरा महसूस नहीं करते वो बुलाए गए और बिन बुलाए दोनों ही मेहमानों का भरपूर आदर-सत्कार करते हैं.

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लॉरेंस ने इस समुदाय के बारे में लिखा है कि अरबों के झंडा बुलंद करने से पहले तुर्की अफ़सरों को बद्दू लोगों की देख-रेख में दमिश्क़ भेजा गया.

आज भी दशकों पुराना पहनावा

दरअसल वादी रम के लोगों का यक़ीन है कि दर पर आने वाला हर शख़्स मेहमान है. उसके खाने-पीने सोने का ख़याल रखना उनका फ़र्ज़ है. रेगिस्तान में हर कोई एक दूसरे का दोस्त है. यहां किसी भी आने वाले से कोई सवाल नहीं किया जाता. हां, अगर वो एक दिन से ज़्यादा ठहरता है तो फिर सवाल होता है.

हालांकि लॉरेंस के ज़माने से अब तक तकनीक और बढ़ते टूरिज़्म की वजह से काफ़ी बदलाव आया है. लेकिन, बद्दू लोगों की बहुत सी चीज़ें आज भी नहीं बदली हैं. मिसाल के लिए उनका पहनावा आज भी वैसा ही है, जैसा सदियों पहले था. वो आज भी सिर पर शिमग़ नाम का सफ़ेद स्कार्फ़ पहनते हैं और उसे अजल नाम के काले रंग वाले रस्सीनुमा टायर से सिर पर टिकाए रहते हैं.

सफ़ेद रंग का लंबा कुर्ता उनका पारंपरिक लिबास है जिसे वो थॉब कहते हैं. उनकी मेहमाननवाज़ी में भी कोई बदलाव नहीं आया है. बद्दू लोगों के नाम लेना और उन्हें याद रखना आसान काम नहीं है. उनके नाम में दादा से लेकर परदादा का नाम और उनके क़बीले का नाम जुड़ा होता है.

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यहां की पहाड़ियां बहुत ऊबड़-खाबड़ और लहरदार हैं. लेकिन जो लोग यहां रहने के आदी हैं वो इन पहाड़ों पर मकड़ी की तरह चढ़ जाते हैं. हरेक बद्दू के साथ एक ऊंट ज़रूर होता है. ऊंट के सहारे ही वो पूरे रेगिस्तान की सैर करते हैं, जहां दूर-दूर तक रेत ही रेत नज़र आता है. जैसे जैसे सूरज चढ़ता है रेत का रंग बदलने लगता है.

लाल रंग की रेत सूरज की रोशनी पड़ने पर सफ़ेद रंग की नज़र आने लगती है. इसी सफ़ेदी के बीच कहीं-कहीं रेत जामुनी रंग की भी नज़र आती है. इन्हीं रेतीले मैदानों की बीच टूरिस्टों के लिए कैंप बनाए गए हैं. यहां लोग शूटिंग के लिए भी ख़ूब आते हैं. टी. ई. लॉरेंस पर 1962 में बनी फ़िल्म लॉरेंस ऑफ़ अरेबिया की शूटिंग यहीं हुई थी.

यहां पहाड़ों के भी रखे जाते हैं नाम

जॉर्डन के इस इलाक़े में दस मीटर से ज़्यादा ऊंचाई वाले जितने भी पहाड़ हैं उन सभी के नाम हैं. यहां अनगिनत पहाड़ हैं और देखने में सभी एक जैसे लगते हैं. लेकिन, बद्दुओं को इन सभी के नाम बख़ूबी याद हैं. जबल उम्म-अल-इशरीन नाम का पहाड़ी समूह ज़मीनी सतह से 700 मीटर ऊंचा है.

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इसे देखकर चांद पर पहुंचने का एहसास होता है. जितने बड़े इलाक़े में ये रेगिस्तान फैला है, उसके मुक़ाबले यहां की आबादी मुट्ठी भर है. इसीलिए कई-कई किलोमीटर चलने के बाद भी रास्ते भर कोई दूसरा दिखाई नहीं देता.

वादी रम कहने को इस इलाक़े का छोटा-सा गांव है. लेकिन इस छोटे से गांव का क्षेत्रफल भी 720 वर्ग किलोमीटर है. पैमाइश के लिहाज़ से ये न्यूयॉर्क शहर के बराबर है.

जो लोग यहीं पैदा होते हैं और परवरिश पाते हैं, उनके लिए ये खुला रेगिस्तान घर के आंगन जैसा है. अरबी शब्द बद्दू भी शायद यहीं से निकला है. अरबी में बेदू का मतलब है रेगिस्तान में रहने वाला. इन रेगिस्तानियों को छत और आरामदेह बिस्तर नहीं भाता. उनके लिए तो खुला आसमान और रेत का बिस्तर ही काफ़ी है.

मेहमानों पर लागू नहीं होते नियम-क़ानून

बद्दू लोगों का रहन सहने आज भी सदियों पुराना है. इनकी औरतें ग़ैर मर्दों के सामने नहीं आती हैं. इनके तंबुओं में भी मर्दों और औरतों के लिए अलग-अलग हिस्से बने होते हैं. एक ये ज़्यादा पत्नियां रखना इनके समाज का आम रिवाज है. क़बीले के लिए बद्दू लोगों के कई क़ायदे-क़ानून हैं.

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लेकिन मेहमानों पर ये नियम लागू नहीं होते. उन्हें अपने अंदाज़ में रहने की आज़ादी है. बस मेहमान से क़बीले के किसी भी सदस्य को कोई परेशानी नही होनी चाहिए.

बद्दुओं की औरतें बद्दू मर्दों के साथ भी नहीं बैठतीं. उन्हें ज़नानख़ाने में महिलाओं के साथ ही बैठना होता है.

लेकिन मेहमानों की औरतें बद्दू मर्दों के साथ बैठ सकती हैं. महिला मेहमान के सामने बद्दू मर्द को भी पूरा शरीर ढांपकर रखना होता है.

मेहमाननवाज़ी की शुरुआत कॉफ़ी से होती है. अगर कॉफ़ी और पीने का मन हो तो कप को सीधी लाइन में आगे बढ़ाना होता है.

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अगर मन ना हो तो एक कॉफी पीने के बाद खाली कप को थोड़ा सा हिलाकर रख देना होता है. एक बार में तीन कप ही सर्व किए जाते हैं. इससे ज़्यादा की डिमांड लालच समझा जाता है.

अगर मेहमान दूर से आया है तो उसे खाना भी परोसा जाता है. किसी दोस्त या अज़ीज़ के आने पर उसकी रज़ामंदी से बकरा हलाल किया जाता है. उसके गोश्त से बद्दुओं की रिवायती डिश मनसफ़ तैयार की जाती है.

इसका शोरबा बकरी के दूध से बने पनीर से तैयार होता है. इस पनीर को जमीद कहते हैं. मनसफ़ को तंदूरी रोटी और चावल के साथ परोसा जाता है.

धीमी आंच पर पकने के सबब मनसफ़ तैयार होने में काफ़ी समय लगता है. इसीलिए अगर मेहमान जल्दी में है, तो, उसे ज़र्ब नाम का दूसरा पकवान परोसा जाता है.

ज़र्ब बकरी के बच्चे के गोश्त और सब्ज़ी के साथ रेत में भून कर बनाया जाता है. लेकिन, ये मनसफ़ के मुक़ाबले जल्दी पक जाता है.

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हरेक बद्दू टेंट के बाहर ज़मीन के अंदर तंदूर बना होता है. जिसे काम के बाद ढक्कन से मूंद दिया जाता है.

रात के खाने के बाद मेहमान के मनोरंजन के लिए रेबाब नाम का संगीत यंत्र बजाया जाता है और पारंपरिक गाने गाए जाते हैं. कहा जा सकता है कि मेहमाननवाज़ी के मामले में बद्दू लोग बहुत हद तक भारतीयों जैसे हैं.

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