भारत के इस फूल को देखने के लिए क्यों लाखों रुपये खर्च करते हैं पर्यटक

  • सृष्टि चौधरी
  • बीबीसी ट्रैवल
नीलकुरिंजी

इमेज स्रोत, Mayank Soni

कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारत के हर कोने को क़ुदरत ने नेमतों से नवाज़ा है. शहरों, गांवों, पहाड़ों और गुफ़ाओं में कुदरत के ऐसे राज़ छिपे हैं, जिनसे पर्दा उठता है तो इंसान हैरत में पड़ जाता है.

आज आपको एक ऐसे फूल की कहानी बताते हैं जो बारह साल में एक बार खिलता है. और इसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग खिचे चले आते हैं.

ईश्वर के देश के नाम से मशहूर केरल, हरे-भरे पहाड़ों, समुद्री किनारों और क़ुदरती नज़ारों के लिए मशहूर है. इस राज्य की सबसे ख़ूबसूरत जगह है, मुन्नार जो समुद्र की सतह से 1600 मीटर ऊपर है.

कहानी नीलकुरिंजी की

ये जगह कॉफ़ी और मसालों की खेती के लिए मशहूर है. यहां की हरियाली और सुकून सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित करता है. यही वो जगह है जहां हिंदुस्तान का सबसे बड़ा राज़ छिपा है जिसका नाम है नीलकुरिंजी.

इमेज स्रोत, NAtional Geographic Image Collection/Alamy

नीलकुरिंजी दुनिया के दुर्लभ फूलों में शुमार होता है. ये 12 साल में एक बार खिलता है. और इस साल केरल में इस फूल की बहार है.

केरल के लोग इसे कुरिंजी कहते हैं. ये स्ट्रोबिलेंथस की एक क़िस्म है. इसकी क़रीब 350 फूलों वाली प्रजातियां भारत में ही हैं.

स्ट्रोबिलेंथस की अलग-अलग प्रजातियों के फूलों के खिलने का समय भी मुख़्तलिफ़ है. कुछ चार साल में खिलते हैं, तो कुछ आठ, दस, बारह या सोलह साल में खिलते हैं.

इमेज स्रोत, Mayank Soni

लेकिन ये फूल कब खिलकर ख़त्म हो जाते हैं किसी को पता ही नहीं चलता. वजह है कि ये फूल ज़्यादातर सड़क किनारे ही खिलते हैं और सड़कें चौड़ी करने के मक़सद से इन फूलों के उगने की ज़रख़ेज़ ज़मीन ख़त्म हो गई है.

इसके अलावा चाय और मसालों की खेती के लिए बड़े पैमाने पर ज़मीन ले ली गई है. इस वजह से भी इन फूलों के लिए ज़मीन नहीं बची.

केरल में अब इन फूलों को मिली जगह

अब इस अजूबे फूल के लिए केरल में जगह संरक्षित की जाती है, क्योंकि इसके खिलने का इंतज़ार सभी को रहता है.

यूं तो केरल के पहाड़ गहरे हरे और नीले हैं लेकिन इस फूल के खिलने के बाद तमाम वादियां बैंगनी नज़र आने लगती है.

ये फूल अगस्त के महीने में खिलना शुरू होता है और अक्टूबर तक इसका मौसम रहता है.

इस फूल के लिए कुरिंजीमाला नाम का संरक्षित क्षेत्र यानी सैंक्चुअरी भी है जोकि मुन्नार से 45 किलोमीटर दूर है.

इमेज स्रोत, Mayank Soni

पर्यावरण कार्यकर्ता और सेव कुरिंजी कैंपेन काउंसिल के सदस्य आर.मोहन के मुताबिक़ हर किसी की ख़्वाहिश रहती है कि वो इस फूल को खिलता हुआ देख ले. तोडस, मथुवंस और मनडियास जाति के आदिवासी इस फूल की पूजा करते हैं.

2006 में केरल के जंगलों का 32 वर्ग किलोमीटर इलाक़ा इस फूल के संरक्षण के लिए सुरक्षित रखा गया था. इसे कुरिंजीमाला सैंक्चुअरी का नाम दिया गया.

ये सैंक्चुअरी कुरिंजी कैंपेन काउंसिल की कोशिशों का नतीजा है.

इमेज स्रोत, Mayank Soni

वैली ऑफ़ फ़्लॉवर के बाद ये भारत की दूसरी फ़्लॉवर सैंक्चुअरी है. यहां नीलकुरिंजी की तमाम प्रजातियां संरक्षित की जाती हैं.

एक ज़िंदगी एक फूल

नीलकुरिंजी एक मोनोकार्पिक पौधा है. यानी एक बार फूल आने के बाद इसका पौधा ख़त्म हो जाता है.

फिर नए बीज के पनपने के लिए ख़ास वक़्त का इंतज़ार होता है. भारत में इस फूल का सांस्कृतिक महत्व भी है.

इमेज स्रोत, Mayank Soni

हिंदू अख़बार के पूर्व संपादक रॉय मैथ्यू ने अपनी किताब में लिखा है कि केरल की मुथुवन जनजाति के लोग इस फूल को रोमांस और प्रेम का प्रतीक मानते हैं.

इस जनजाति की पारंपरिक कथाओं के मुताबिक़ इनके भगवान मुरुगा ने इनकी जनजाति की शिकारी लड़की वेली से नीलकुरिंजी फूलों की माला पहनाकर शादी की थी.

इसी तरह पश्चिमी घाट की पलियान जनजाति के लोग उम्र का हिसाब इस फूल के खिलने से लगाते हैं.

इस फूल का खिलना पूरे केरल के लिए खुशहाली का प्रतीक है. इसके खिलने से टूरिज़्म का कारोबार फलता-फूलता है.

केरल को आर्थिक फायदा पहुंचाने वाला फूल

इमेज स्रोत, Mayank Soni

इस साल भी इस फूल के स्वागत के लिए पूरा केरल, ख़ास तौर से मुन्नार ज़ोर शोर से तैयारियां कर रहा था. होटलों में बुकिंग हो चुकी थी.

सड़कें चौड़ी करने का काम लगभग पूरा हो चुका था. रेस्टोरेंट मालिक नए सिरे से सजावट का काम कर रहे थे. क़रीब दस लाख सैलानियों के आने की उम्मीद थी.

लेकिन बदक़िस्मती से इस फूल के खिलने के समय ही केरल में क़ुदरत का क़हर नाज़िल हो गया.

इस साल केरल की बाढ़ में लगभग 483 लोगों की मौत हुई. दस हज़ार किलोमीटर तक सड़कें तबाह हुईं. यही नहीं, करोड़ों रूपए की संपत्ति स्वाहा हो गई.

हालात इतने ख़राब हुए कि खाने के लाले पड़ गए. कोच्चि एयरपोर्ट दस दिन तक बंद रहा. जो जहां फंसा था वहीं रह गया.

ऐसे में सैलानियों के आने का तो सवाल ही नहीं था. इस साल नीलकुरिंजी की कलियां 12 साल के इंतज़ार के बाद चटखीं, लेकिन इसे देखने के लिए सैलानी नहीं थे.

मधुमक्खियां भी हैं इस फूल की दीवानी

इमेज स्रोत, Mayank Soni

इस फूल के खिलने से पहले इसे लगभग दस दिन सूरज की रोशनी दरकार होती है. लेकिन लगातार बारिश ने ये मौक़ा भी नहीं दिया.

सितंबर महीने में जब धूप निकली तब ये फूल खिला. लेकिन इसके खिलने के शुरूआती दिन बारिश की भेंट चढ़ गए. जिन्हें इस फूल को देखना था वो केरल और तमिलनाडु के बॉर्डर पर ऊंचाई वाले इलाक़ों में पहुंचे, लेकिन केरल नहीं आए.

नीलकुरिंजी फूल से भी ज़्यादा दुर्लभ है इसका शहद, जिसे कुरिंजीथन कहते हैं. इस फूल का रस मधुमक्खियों को ख़ूब पसंद है.

लेकिन इस दुर्लभ शहद को सिर्फ़ स्थानीय आदिवासी ही हासिल कर सकते हैं. और इसे बाज़ार में बेचा नहीं जाता.

इमेज स्रोत, Mayank Soni

स्थानीय लोगों के मुताबिक़ इसके बहुत से औषधीय गुण हैं, इसीलिए वो इसे अपने पास ही रखते हैं.

लेकिन इस शहद के औषधीय गुणों पर अभी तक कोई रिसर्च नहीं हुई है. साथ ही मधुमक्खियां नीलकुरिंजी के अलावा और भी बहुत से फूलों पर बैठती हैं. इसलिए ये दावा नहीं किया जा सकता कि ये शहद पूरी तरह से नीलकुरिंजी फूल का ही है.

बहरहाल अगस्त से अक्टूबर तक इसी फूल की बहार होती है. लिहाज़ा कहा जा सकता है कि लगभग 70 फ़ीसद शहद इसी फूल के रस का होता है.

यहां के आदिवासी लोग इस शहद को तोहफ़े के तौर पर एक दूसरे को देते हैं और नवजात को भी यही शहद चटाया जाता है.

अब 2030 में खिलेगा ये फूल

इस साल के बाद ये फूल अब 2030 में खिलेगा. लेकिन किस पैमाने पर खिलेगा कहना मुश्किल है.

जिस तेज़ी से शहरीकरण के नाम पर क़ुदरत के साथ खिलवाड़ हो रहा है उसे देखते हुए बहुत-सी दुर्लभ प्रजातियों को बचाना मुश्किल है.

इमेज स्रोत, LENS AND LIGHT/BALAN Madhavan/Alamy

हालांकि, सेव कुरिंजी कैंपेन काउंसिल इस फूल के संरक्षण के लिए बड़े पैमाने पर काम कर रही है और लोगों को जागरूक कर रही है.

ताकि, आने वाली पीढ़ियां भी इस ख़ूबसूरत फूल का नज़ारा कर सकें. लेकिन इनकी कोशिशों के आगे शहरीकरण की मार ज़्यादा तेज़ है.

तरक़्क़ी और क़ुदरती ख़ूबसूरती की इस जंग में उम्मीद यही की जा रही है कि क़ुदरत जीतेगी.

ये भी पढ़ें:-

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)