एक मुल्क जिसका कोई वजूद नहीं है

  • 26 नवंबर 2018
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एक भारी आवाज़ दियारबकर शहर की गलियों से उठी और पूरी फ़िज़ा में घुल गई. अगर आप को कुर्द ज़ुबान का एक भी लफ़्ज़ न आता हो, तो भी आवाज़ में घुला हुआ दर्द आप दिल से महसूस कर पाएंगे.

तुर्की का दियारबकर शहर, तुर्की कुर्दिस्तान की राजधानी कहा जाता है. ये तूफ़ानी नदी दजला के किनारे चौड़े पाट पर बसा है.

मेरा दियारबकर जाना गर्मियों के दिनों में हुआ. उस वक़्त भयंकर गर्मी पड़ रही थी. पूरा इलाक़ा मानो तपते सूरज की किरणों से पीला पड़ गया था. शहर की काली सड़कें तप रही थीं.

दिन के वक़्त तो पूरा शहर वीरान मालूम होता था. मगर शाम के वक़्त उछलते-कूदते शोर मचाते बच्चे, माहौल को हल्का बना देते थे. सिर पर दुपट्टा डाले हुए औरतें घर के काम निपटाने के बाद सामान ख़रीदने के लिए घर से निकलतीं और गाड़ियों में ढेर सारा सामान लाद कर लौटतीं.

ये इलाक़ा अपने उपजाऊपन के लिए जाना जाता है.

जो भारी सी दर्द भरी आवाज़ मैंने सुनी थी, वो दियारबकर की गलियों में गूंज रही थी. काली ईंटों वाली इमारतों की क़तारों के बीच से आती वो आवाज़ मुझे एक बड़े से आंगन की तरफ़ खींच ले गई.

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कुर्दिस्तान का दर्द भरा इतिहास बताती आवाज़

गलियों में अंजीर और शहतूत के पेड़ तपती धूप से राहत दे रहे थे. गलियों से गुज़रते हुए आवारा कुत्तों के भौंकने की आवाज़ और दुकानदारों की बांग सुनाई देती थी. कभी-कभार कार का हॉर्न भी बजता सुनाई देता था. इतनी आवाज़ों के बीच भी वो दर्द भरी आवाज़ अलग ही सुनाई दी थी. वो आवाज़ जो मुहब्बत, उम्मीद, ग़म और नाउम्मीदी को एक साथ बयां करती थी.

गलियों से गुज़रते हुए आख़िर में हम खुले से सहन में दाख़िल हुए. इसे माला देंगबेज यानी देंगबेज का मकान कहा जाता है. यहां आधुनिक दिखने वाला खुला सा आंगन था. जिसे अच्छे से तराश कर नया लुक दिया गया था. ये कम से कम एक सदी पुरानी इमारत थी. यहां पर ओपन-एयर थिएटर था.

जिस दर्द भरी आवाज़ का ज़िक्र हम कर रहे थे, वो इसी जगह से आ रही थी. और वो बयां कर रही थी कुर्दिस्तान का दर्द भरा इतिहास और इसके साथ क़िस्मत का क्रूर मज़ाक़. जिस इलाक़े को कुर्दिस्तान कहा जाता था, वो आज चार मुल्कों के बीच बंटा हुआ है. 1916 में अंग्रेज़ों और फ्रांसीसियों ने मिलकर कुर्दिस्तान को सीरिया, इराक़, तुर्की और ईरान में बांटने का गुपचुप समझौता कर लिया था. आज 2.5 से 3.5 करोड़ कुर्द बेमुल्क के बाशिंदे हैं. उनका अपना वतन नहीं है. लेकिन, अपनी ज़ुबान, संस्कृति, सभ्यता, परंपरा और साझा इतिहास की मदद से कुर्दों ने अपने वतन को अपने दिलों में ज़िंदा रखा है.

1923 में तुर्की की स्थापना से पहले कुर्द ज़ुबान और संस्कृति को अपनी पहचान बचाने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है. तुर्की के शासकों का पूरा ज़ोर कुर्दों की अलग पहचान मिटाकर उन्हें कुर्द से तुर्क बनाने पर रहा है. क़रीब एक सदी से कुर्द लोग अपने अलग देश की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं.

अभी दो साल पहले यानि 2016 में कुर्द उग्रवादियों का तुर्की की सरकार के साथ हिंसक संघर्ष हुआ था. इस लड़ाई में पुराने दियारबकर शहर का बड़ा हिस्सा तबाह हो गया. इस इलाक़े में आज चल रहे निर्माण कार्य असल में उस जंग के ज़ख़्मों के निशान हैं. पुनर्निर्माण के लिए शहर के एक बड़े हिस्से की घेरेबंदी कर के उसे अलग कर दिया गया है.

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Image caption माला देंगबेज के आंगन में ऊटपटांग और बेमेल कुर्सियां आने-जाने वालों की तशरीफ़ के लिए रखी गई हैं.

आवाज़ का जादूगर

माला देंगबेज के आंगन में ऊटपटांग और बेमेल कुर्सियां आने-जाने वालों के बैठने के लिए रखी गई हैं. आंगन के पिछले हिस्से में क़रीब दर्जन भर लोग बैठे थे. उम्र के लंबे सफ़र का तजुर्बा उनके चेहरे की झुर्रियों और पके हुए बालों से झलक रहा था. छोटी आस्तीन और हल्के रंगों वाली कड़क इस्त्री की हुई क़मीज़ों में वो दिलकश लग रहे थे.

धारीदार क़मीज़ पहने हुए एक तगड़ा सा मूंछों वाला आदमी अपनी कहानी सुना रहा था. ये एक महाकाव्य था. जिसमें आधा गद्य और आधी नज़्म थी. यानी क़िस्सा भी था और कविता भी.

वो अपनी कुर्सी पर आगे की तरफ़ झुका और दाएं-बाएं झूमते हुए बड़े सधे हुए और बुलंद तरीक़े से अपनी कहानी सुना रहा था. उसकी कोशिश थी कि आंगन में मौजूद हर शख़्स तक उसकी आवाज़ पहुंच जाए.

कुछ ख़ास बातों पर ज़ोर डालने के लिए वो शख़्स कई बार अपने बाएं हाथ को उठाकर इशारे करता था. उसके दाहिने हाथ में एक तस्बीह (मुसलमान जिसे अपने हाथों में लेकर जाप करते हैं) थी, जिसके मोतियों को वो एक-एक करके आगे करता जा रहा था. इस शख़्स ने कई घंटे तक क़िस्साग़ोई की और इस दौरान उसने एक बार भी अपनी बात रखने के लिए नोट्स का सहारा नहीं लिया.

पूरे माहौल में उसकी आवाज़ गूंज रही थी. कभी कविता, तो कभी डायलॉग के ज़रिए उसने जो कहानी सुनाई थी, उसमें रफ़्तार से लेकर ठहराव तक के न जाने कितने पेंच-ओ-ख़म थे. वो शख़्स आवाज़ का जादूगर था. उसने अपनी बातों और अंदाज़ से जादुई समां बांध दिया था. वहां मौजूद लोग सांसें थाम कर क़िस्सा सुन रहे थे और बार-बार हाथों से इशारे कर के तारीफ़ कर रहे थे.

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क्या है देंगबे

कुर्द शब्द देंगबे का मतलब होता है आवाज़ का जादूगर. ये दो शब्दों देंग यानि आवाज़ और बे यानि कहना से मिलकर बना है. ये अपने आप में एक कला भी है और इस कला का प्रदर्शन करना भी.

असल में देंगबे के कलाकार घुमंतू क़िस्सागो होते हैं, जो अपने क़िस्से-कहानियों से कुर्दों के इतिहास और पौराणिक कहानियों को ज़िंदा रखे हुए हैं.

कुर्द इलाक़ों के गांवों और क़स्बों में किसी तयशुदा जगह पर इकट्ठा होकर ये क़िस्से-कहानियां सुनने-सुनाने की परंपरा रही है. कहानी सुनाने वाले ज़्यादातर मर्द होते हैं. पर कई महिला गायिकाएं भी हुई हैं, जो देंगबे परंपरा की ध्वजवाहक हैं. वो पढ़ी-लिखी भले न हों. मगर अपने ज़ुबानी हुनर की वजह से वो अपने ज़हन में क़िस्सों, तजुर्बों और इतिहास की लाइब्रेरी लेकर चलती हैं, जो दौलत पीढ़ी-दर-पीढ़ी कहानियों की शक्ल में विरासत के तौर पर सौंपी जाती रही है.

तुर्की में देंगबे परंपरा को बहुत मुश्किलें झेलनी पड़ीं. कुर्दिश अलगाववाद को थामने के लिए 1983 से 1991 के बीच सार्वजनिक रूप से कुर्द ज़ुबान बोलने, लिखने और पढ़ने पर पाबंदी लगा दी गई थी.

कुर्द साहित्य और संगीत रखना जुर्म घोषित कर दिया गया था. लेकिन, ये देंगबे की परंपरा ही थी, जिसने कुर्द संस्कृति को बचाकर रखा.

ब्रिटेन की एबरडीन यूनिवर्सिटी में कुर्द रिसर्चर हनीफ़ी वारिस कहते हैं, ''मुझे लगता है कि देंगबे कला इसलिए ज़ुल्म से बच गई क्योंकि ज़्यादातर कुर्द ग्रामीण इलाक़ों में रहते हैं. मेहमानख़ानों में लोगों का इकट्ठे होकर क़िस्सागोई का लुत्फ़ उठाना चलता रहा. ठंड के दिनों में तो ऐसी महफ़िलें ख़ास तौर पर जमती थीं. मैं ख़ुद ऐसे ही घर में पला-बढ़ा हूं.''

इन बैठकों को सेवबर्क यानी शाम का वक़्त काटना कहते थे. इन बैठकों में देंगबे की क़िस्साग़ोई की परंपरा बची रही और कुर्दों के क़िस्से-कहानियां भी. गुपचुप तरीक़े से कुर्द अपनी पौराणिक कहानियों और कला को संरक्षित करते रहे.

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जब बेहतर हुए संबंध

इक्कीसवीं सदी की शुरुआत से कुर्दों और तुर्कों के बीच रिश्ते बेहतर होने शुरू हुए. कुर्द भाषा को बोलने की और इसके साहित्य को छापने और पढ़ने की मंज़ूरी दे दी गई. सरकारी टीवी और रेडियो पर कुर्द भाषा में प्रसारण होने लगे. 2009 में कुर्द ज़ुबान में टीवी चैनल शुरू किया गया. 2012 में एक स्कूल को कुर्द भाषा पढ़ाने की इजाज़त दे दी गई.

माला देंगबे 2007 में खुला था. कुर्द समर्थक नगर निगम ने देंगबे परंपरा में नई जान डालने और इसे पहचान देने के लिए ये जगह तय की. अब देंगबे परंपरा को मुख्यधारा में लाने में माला देंगबे ने बहुत अहम रोल निभाया है.

माला देंगबे सुबह नौ बजे से शाम छह बजे तक खुला रहता है. ये मंगलवार से रविवार तक खुला होता है. यहां पर परफॉर्मेंस का कोई तयशुदा मानक नहीं है. बल्कि ये लोगों के मेल-जोल और सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने का ठिकाना है. चाय के दौर पर दौर चलते रहते हैं और चलता रहता है क़िस्सागोई का सिलसिला.

जब नए लोग यहां पहुंचते हैं तो तालियां बजाकर और गाल पर एक चुंबन देकर उनका स्वागत किया जाता है. यहां जो नज़्में गा कर सुनाई जाती हैं, उन्हें कलाम कहते हैं. ये गीत जंग, बहादुरी, धोखेबाज़ी और मुहब्बत की दास्तानें कहते हैं. इनमें कुर्दों के तमाम गुटों के संबंधों का बखान भी होता है. वो कुर्द परंपरा और क़िस्से-कहानियों को ज़िंदा रखते हैं. इसके इतिहास को आने वाली नस्लों के लिए संजोते हैं.

ऐतिहासिक क़िस्से और पौराणिक कहानियां सुना कर इनका मक़सद कुर्दों के बीच एकता को बनाए रखना होता है. पुराने लोगों से सुने क़िस्से सुनाने के अलावा परफ़ॉर्म करने वाले कलाकार ख़ुद अपनी नज़्में और क़िस्से भी लिखकर सुनाते हैं.

हनीफ़ी वारिस कहते हैं, ''देंगबे गीत मेरे अंदर जो जज़्बात जगाते हैं, वो तो कोई संगीत नहीं पैदा कर सकता. शायद इसकी वजह ये भी है कि मैं अपने मां-बाप को बड़े भावुक होकर ये गीत गाते हुए सुन कर बड़ा हुआ हूं. मुझे नहीं पता कि वो इतने जज़्बाती क्यों हो जाते हैं.'

कुर्दिस्तान के ग्रामीण इलाक़ों में आज भी छोटी-छोटी महफ़िलों में देंगबे की परंपरा निबाही जा रही है.

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देंगबे के लिए चुनौती

हालांकि, अब देंगबे को क़ानूनी मान्यता मिल गई है पर इसके सामने टीवी चैनलों के रूप में नई चुनौती खड़ी हो गई है. लोग शहरों की तरफ़ भाग रहे हैं.

ऐसे ही एक शख़्स हैं बरान सेटिन. वो पहाड़ी गांव में पैदा हुए थे, जो आर्मीनिया की सीमा से लगा हुआ था. वो जगह तो ख़ूबसूरत थी. मगर ज़िंदगी बहुत मुश्किल. 32 बरस के बरान अब इस्तांबुल शहर में रहते हैं. यहां पर क़रीब 30 लाख कुर्द रहते हैं.

बरान के चाचा देंगबे कलाकार हैं. उन्होंने अपने पिता से ये कला सीखी थी. बरान कहते हैं कि उनकी आवाज़ देंगबे बनने लायक़ नहीं. इस परंपरा की मशाल तो पुराने लोगों ने ही थाम रखी है.

बरान कहते हैं, ''जब मैं देंगबे सुनता हूं, तो मैं उसी में खो जाता हूं. ये ज़िंदगी के हर पहलू की नुमाइंदगी करते हैं. आप उम्मीद भी महसूस कर सकते हैं और ख़ुशी भी. साथ ही साथ आपको इन में दर्द का एहसास भी मिलेगा.''

दर्द को तुर्की भाषा में हुज़ुन कहते हैं.

नोबल पुरस्कार विजेता ओर्हन पामुक ने हुज़ुन के बारे में लिखा था कि ये सिर्फ़ दर्द नहीं है. ये किसी चीज़ को गंवाने की तकलीफ़ का तजुर्बा है. पामुक ने अपनी किताब 'इस्तांबुल: मेमोरीज़ ऐंड द सिटी' में लिखा था कि 'हुज़ुन की ग़ैरमौजूदगी, इसकी तड़प का एहसास कराती है.'

माला देंगबे में बैठ कर क़िस्सागोई सुनते हुए मुझे वक़्त का एहसास ही नहीं रहा. हर कलाकार ने अपनी अलग कहानी सुनाकर सुनने वालों को नए सफ़र पर होने का एहसास कराया. कुर्द इतिहास की झलकियां दिखाईं.

मुझे यूं तो एक भी लफ़्ज़ समझ में नहीं आ रहा था. मगर मैंने कहानियों के समंदर में गोते लगा लिए.

कुर्दों का हालिया इतिहास तकलीफ़ भरे तजुर्बे का रहा है. ये ओर्हन पामुक का हुज़ुन है. पर, साथ ही इसमें एक उम्मीद भी है. क़िस्से सुनाते हुए कुर्द परंपरा को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंपने से कुर्द संस्कृति ज़िंदा रहेगी.

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(यह लेख बीबीसी ट्रैवेल की कहानी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं. मूल लेख आप यहांपढ़ सकते हैं. बीबीसी फ़्यूचर के दूसरे लेख आप यहां पढ़ सकते हैं.)

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