E69: वो हाइवे जो दुनिया के आख़िरी छोर तक ले जाता है

  • 29 दिसंबर 2018
दुनिया का अंतिम छोर

सर्दियों के दिन हैं. पहाड़ों पर ख़ूब बर्फ़बारी हो रही है. ये कहें कि पूरा का पूरा उत्तरी गोलार्ध ठंड के आग़ोश में है, तो ग़लत नहीं होगा.

ये सर्द हवाएं आती हैं उत्तरी ध्रुव से. धरती का सबसे उत्तरी छोर, जहां तक पहुंचना, चांद तक जाने जैसा मुश्किल है.

यूरोप महाद्वीप, उत्तरी ध्रुव के बेहद क़रीब है. महाद्वीप का आख़िरी छोर नॉर्वे में पड़ता है. इस इलाक़े में सदियों से इंसान रहता आया है, बाक़ी दुनिया से अलग-थलग. यहां के लोग समंदर के जानवरों जैसे मछलियों, व्हेल और केकड़ों का शिकार कर के अपनी ज़िंदगी बसर करते आए हैं.

इस इलाक़े को बाक़ी दुनिया से जोड़ने का काम करता है, ई-69, ये एक सड़क है, जो उत्तरी ध्रुव के इस क़रीबी इलाक़े यानी दुनिया के आख़िरी छोर तक जाती है. ये धरती की सबसे उत्तरी सीमा तक जाने वाला हाइवे है. इसे इंजीनियरिंग का शानदार शाहकार कहें, तो ग़लत नहीं होगा.

इस बर्फ़ीले हाइवे की कल्पना आज से एक सदी से भी ज़्यादा पहले यानी 1908 में की गई थी. लेकिन, ई-69 बनकर तैयार हुआ 1999 में. ये नॉर्वे के ओल्डरफ्योर्ड को नॉर्डकाप इलाक़े से जोड़ता है.

विरोधाभासों को जोड़ने वाली सड़क

पश्चिमी यूरोप के तटीय छोर से गुज़रने वाला ई-69 को इंसान के विरोधाभासों को जोड़ने वाली सड़क कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा. ये उन इलाक़ों को आधुनिक यूरोप से जोड़ता है, जो सदियों से अलग-थलग रहते आए हैं. जिनका आज की दुनिया से कोई वास्ता नहीं रहता.

ये वो लोग हैं, जो बाक़ी दुनिया से अलग रह कर भी मज़े से ज़िंदगी बसर कर लेते हैं. उन्हें बाक़ी दुनिया से संपर्क की ज़रूरत ही नहीं. आज भी वो लकड़ी की नावों के सहारे ज़िंदगी का सफ़र तय कर लेते हैं.

इस सड़क पर सफ़र के लिए निकलें, तो आप क़ुदरत को एकदम बुनियादी और विशुद्ध रूप में देखेंगे. यूं लगता है कि जैसे पहाड़ आप को अफने आग़ोश में लेने को आमादा हैं.

कटावदार सड़क बेहद बर्फ़ीले इलाक़े से गुज़रती है. कहीं खाई, तो कहीं ऊंचे टील हैं. ई-69 के कई हिस्से तो ऐसे हैं, जहां किसी का अकेले गाड़ी चलाना मना है. आप काफ़िले के साथ ही वहां से गुज़र सकते हैं. समंदर के किनारे से गुज़रता ये हाइवे कई बार तो गांवों के गुम समंदर में गुम हो जाने का एहसास कराता है.

1930 में विकास की शुरुआत

ई-69 के विकास की शुरुआत 1930 के दशक में हुई थी. उस वक़्त यहां के बाशिंदों का मछली का कारोबार मंदा हो रहा था. पहले नॉर्डकाप के लोगों के पास समंदर में शिकार के अकेले अधिकार हासिल थे. लेकिन, 1930 के दशक में इस अधिकार पर दूसरे साझीदारों का भी हक़ हो गया.

इसके बाद 1934 में इलाक़े के लोगों ने हॉनिंग्सवैग नाम के गांव में बैठक की. इसमें इलाक़े के सभी अहम लोग शामिल हुए. बंदरगाह के मालिकों ने मांग की कि इस जगह तक आने के लिए भी सड़क बनाई जाए, ताकि सैलानियों की आवाजाही से आमदनी का नया रास्ता खुले.

उत्तरी ध्रुव के क़रीब होने की वजह से यहां गर्मियों के दिनों में सूरज डूबता ही नहीं और सर्दियों में रातें ही ख़त्म नहीं होतीं.

यहां रहने वाली शिल्पकार इंगुन उत्सी कहती हैं कि बचपन में ऐसी सड़क की कल्पना भी कोई नहीं करता था. यहां के लोग, बाक़ी ज़माने से अलग ही रहना पसंद करते थे. बड़े शहर उन्हें नापसंद थे. लेकिन, आज ये हाइवे उनके लिए जीवनदान लेकर आया है.

कभी नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में रहने वाली उत्सी 1982 में धरती के इस उत्तरी छोर पर रहने के लिए आ गई थीं. तब से वो यहां पर लकड़ी और पत्थर तराशकर उनसे कलाकृतियां बनाने का काम करती आई हैं. वो यहां के बेहद मुश्किल हालात को अक्सर अपनी कृतियों में उकेरती हैं. वो कलाकृतियां बनाने के लिए बहकर आई लकड़ी के टुकड़ों का इस्तेमाल करती हैं. कभी उनकी कृतियों में हवा तो कभी बर्फ़ के रूप देखने को मिलते हैं.

मछलियों का कारोबार

क़ुदरत की बहुत बुनियादी चीज़ें मसलन, बर्फ़, हवा और समंदर के बूते ज़िंदगी की कल्पना इतनी आसान नहीं होती. यहां आने वालों को शायद ये एहसास न हो कि आधुनिक जीवन यहां कुछ अरसे पहले ही आया है.

नॉर्डकाप आने वाले ई-69 हाइवे के आख़िरी 14 किलोमीटर की सड़क 1956 में बनाई गई थी. तब इसका मक़सद गर्मियों में सैलानियों की आवाजाही का रास्ता खोलना भर था.

ई-69 एक्सप्रेसवे के आख़िरी छोर पर एक सुरंग है, जो समुद्र के अंदर बनाई गई है. ई-69 का ये हिस्सा मैगेरोया नाम के द्वीप को पोरसैंगर प्रायद्वीप से जोड़ता है. ये सुरंग 1999 में बनकर तैयार हुई थी.

बीसवीं सदी की शुरुआत में जब बाक़ी दुनिया के मछुआरों को यहां शिकार करने की इजाज़त मिली तो दूर-दूर से लोग यहां मछलियां मारने के लिए आने लगे थे. लेकिन, अब ये भीड़ कम होती जा रही है.

मछलियों के शिकारियों के झुंड कम हो गए हैं. यहां जो लोग मछलियां पकड़ते भी हैं, वो उन्हें तुरंत बर्फ़ में जमाकर चीन भेज देते हैं. वहां से ये मछलियां बाक़ी दुनिया को भेजी जाती हैं.

नॉर्वे के इसी इलाक़े में किंग केकड़े की उत्तरी यूरोप की सबसे बड़ी खेप पकड़ी जाती है. आज भी मछलियां पकड़ने वाली नावों की कतारें यहां के बंदरगाह पर देखने को मिलती हैं.

प्रकृति के सबसे करीब

यहां के शांत माहौल में कला का भी प्रस्फुटन ख़ूब होता है.

जैसे कि इंगुन उत्सी यहां तीन दशक से भी ज़्यादा वक़्त से कलाकृतियां बना रही हैं. उत्सी की ही तरह हैं जर्मन कलाकार इवा श्मटरर हैं, जो मछुआरों के गांव कमोयेवर में रहती हैं.

इवा श्मटरर अपनी कलाकृतियां बनाने के लिए स्थानीय लोगों से रद्दी काग़ज़ जमा करती हैं. इवा कहती हैं कि इस इलाक़े में कलाकृतियां बनाने का सामान मिलना मुश्किल है. ऐसे में रद्दी काग़ज़ से लेकर बहकर आई लकड़ी तक का इस्तेमाल हो जाता है. इवा कहती हैं कि यहां पर लोग आज भी वैसे ही रह रहे हैं, जैसे एक सदी पहले रहते थे. ई-69 इस इलाक़े के लोगों के लिए वरदान बनकर आया है.

इवा श्मटरर कहती हैं कि, 'यहां आप कुछ भी अपनी मर्ज़ी से नहीं कर सकते हैं. यहां आप वही काम कर सकते हैं, जिसकी प्रकृति इजाज़त देती है.'

ई-69 का सबसे अहम मछली मारने का बंदरगाह है हॉन्गिंस्वैग. इसे दुनिया का सबसे उत्तरी क़स्बा कहा जाता है. यहां आने पर आप को क़तार में लगी रंग-बिरंगी नावें दिखेंगी. सर्दियों में यहां कॉड मछली का शिकार होता है, तो बसंत ऋतु में सॉल्मन और कोलफ़िश का, तो पतझड़ में यहां हैडॉक नाम की मछली पकड़ी जाती है.

हाईवे का आख़िरी छोर

नॉर्वे के फ़िल्मकार क्नट एरिक जेन्सेन ने इस इलाक़े में अपनी कई फ़िल्मों की शूटिंग की है.

जेनसेन कहते हैं, 'मैं पहले ये सोचता था कि नॉर्वे में कोई मूर्ख ही होगा जो इतने उत्तरी इलाक़े में आकर बसता होगा. लेकिन, मेरी सभी फ़िल्में यहीं शूट की गई हैं. मैंने हमेशा यहां के मछुआरों से प्रेरणा ली है. सदियों से यहां पुर्तगाल, स्पेन और दूसरे देशों से मछुआरे आते रहे हैं. अगर आप हॉनिंग्स्वैग से ताल्लुक़ रखते हैं, तो बिना कहीं गए हुए आप को दुनिया के तमाम हिस्सों में घूमने का तजुर्बा हो जाता है. कई बार मुझे लगता है कि बड़े शहरों में रहने वाले लोग ज़्यादा अलग-थलग होते हैं, न कि ऐसे दूर-दराज़ के रहने वाले बाशिंदे.'

चीड़ के दरख़्तों, मछली पकड़ने के बडे ट्रॉलर, और गर्मियों में जमा होने वाले रेंडियर के पार आबाद है नॉर्डकाप. ये ई-69 का आख़िरी छोर है. इसके आगे सिर्फ़ समंदर है.

यहां पानी में गहरी अंधेरी रातें भी गुम हो जाती हैं. वहीं गर्मियों में इस इलाक़े में सूरज लगातार कई महीनों तक चमकता रहता है.

इस आख़िरी छोर पर है नॉर्डकाफैलेन. यहां पर ज़मीन के भीतर एक चर्च है और एक म्यूज़ियम भी. ये म्यूज़ियम कभी यहां राज करने वाले किंग रामा पंचम के नाम समर्पित है.

एक दौर था कि यहां के छोर पर दुनिया को ख़त्म मान लिया जाता था. बेहद सर्द पानी अंतरात्मा तक को हिला देता था.

यहां क़ुदरत हर इंसान को सबक़ सिखाती सी मालूम होती है. हर दौर का अंत होता है. बर्फ़ीले मौसम में वीरान और बंज़र पड़ी ज़मीन से ही गर्मियों में नई ज़िंदगी की कोपलें फूलती हैं.

नॉर्डकाप आकर आप को एहसास होता है कि उम्मीद का दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए.

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी ट्रैवल पर उपलब्ध है.)

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