वो देश जिसकी पहचान है- कम्पीटिशन

  • 17 जनवरी 2019
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होड़ लगना स्वाभाविक है. क़ुदरती प्रक्रिया है. आख़िर दुनिया में संसाधनों की कमी है. उसे दूसरों से पहले हासिल करके तरक़्क़ी और कामयाबी की रेस में हर कोई आगे निकलना चाहता है.

डार्विन का 'योग्यतम की उत्तरजीविता' का सिद्धांत होड़ लगाने की भावना पर ही आधारित है.

पर, यूरोप का एक देश ऐसा है जहां प्रतिद्वंदी को मुक़ाबले में पछाड़ना नसों में समाया हुआ है.

इस देश का नाम है-माल्टा.

माल्टा की राजधानी वैलेटा की गलियों में निकल जाएं, तो हर शख़्स दूसरे से होड़ लगाता मालूम होगा. माल्टा की संस्कृति की इस ख़ूबी को 'पीका' कहते हैं. माल्टा की ज़बान के इस शब्द का मतलब है पड़ोसी से प्रतिद्वंदिता. ये पीका शब्द ही माल्टा की जीवनशैली की बुनियाद है.

भूमध्य सागर के क़रीब स्थित छोटे से देश माल्टा ने अपने लंबे इतिहास में उथल-पुथल के कई दौर देखे हैं. कभी ये अरबों के अधीन रहा, तो कभी यूरोपीय तानाशाहों के. कभी इस्लाम के असर से प्रभावित हुआ तो कभी माल्टा ईसाई धर्म प्रचारकों के आगोश में.

तमाम उतार-चढ़ावों में अगर कभी ख़त्म नहीं हुई, तो वो थी माल्टा के लोगों की पीका यानी एक-दूसरे से होड़ लगाने की भावना.

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संतों को लेकर होड़

माल्टा यूनिवर्सिटी में विरासत और सांस्कृतिक पर्यटन के प्रोफ़ेसर जॉर्ज कसार कहते हैं, 'पीका वो भावना है, जो माल्टा के लोगों को अपने क़रीबी लोगों को पछाड़ने के लिए प्रेरित करती है.'

माल्टा में ये परंपरा आम तौर पर दो अलग-अलग कुल गुरुओं या संतों के अनुयायियों के बीच होड़ के तौर पर पलती आई है.

इसे ऐसे समझें कि कोई कबीर का भक्त है, तो कोई संत रविदास का और दोनों के भक्त ख़ुद को बेहतर दिखाने की होड़ लगाते हैं.

माल्टा में हर मुहल्ले के अलग संत या कुल गुरू होते हैं. यहां पर संतों को पूजने की परंपरा को त्यौहार के तौर पर मनाया जाता है. इस दौरान सजावट से लेकर जश्न के दूसरे पहलुओं में आगे निकलने की होड़ लगती है. कई बार तो ये मुक़ाबला इतना आक्रामक हो जाता है कि बात गाली-गलौज और हिंसा तक जा पहुंचती है.

जॉर्ज कसार कहते हैं कि पीका की भावना के चलते ही माल्टा के लोगों ने राजधानी वेलेटा में 1958 में एक पुराने गिरजाघर कार्मेलाइट बैसिलिका को ध्वस्त करके उसकी जगह चर्च की और ज़्यादा शानदार इमारत बनाई थी, ताकि पड़ोस में स्थित एंग्लिकन कैथेड्रल को नीचा दिखा सकें.

इसी होड़ का नतीजा था कि पिछले साल अगस्त में एक परेड के दौरान एक शख़्स के सिर पर किसी ने गमला दे मारा था. इसी घटना के दो हफ़्ते बाद ही एक और परेड के दौरान दो पादरियों ने एक-दूसरे को जमकर भद्दी-भद्दी गालियां दी थीं. बात सिर्फ़ इतनी थी कि जश्न के दौरान सजाई गई वर्जिन मेरी की अपनी-अपनी मूर्तियों को दोनों पादरी बेहतर और दूसरे को पूरे माल्टा में सबसे बदसूरत बता रहे थे.

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कहां से आई पीका की भावना

हर साल माल्टा में फेस्टा सीज़न आता है. जब हर गांव अपने कुल गुरू की याद में जश्न आयोजित करता है. फेस्टा सीज़न जून से सितंबर के बीच आता है. इस दौरान माल्टा के लोगों का भूमध्य सागरीय गर्म ख़ून बहुत उबाल मारता है. जश्न के दौरान दूसरों को नीचा दिखाने के लिए गाली-गलौज तक हो जाती है. 2004 में तो हालात इतने बिगड़ गए थे कि फेस्टा सीज़न को रद्द करना पड़ा था, ताकि हिंसा न भड़के.

साल दर साल हर संत के अनुयायी जश्न में ख़ुद को बेहतर साबित करने के लिए ख़ूब पैसे बहाते हैं. ये परंपरा मध्यकालीन है और येरूशलम से आए कैथोलिक योद्धाओं 'नाइट्स हॉस्पिटालर' के साथ माल्टा पहुंची थी. इन योद्धाओं ने माल्टा पर 1530 से लेकर अगली तीन सदी तक राज किया था.

फेस्टा के दौरान झंडे लहराए जाते हैं. हाथ से बनी कलाकृतियों की नुमाइश की जाती है. भोज होता है. गहनों की प्रदर्शनी होती है.

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माल्टा के अलग-अलग क़स्बों के बीच फेस्टा सीज़न में ज़बरदस्त मुक़ाबला होता है.

ऐसा ही एक क़स्बा है क़ूर्मी. इसके बाशिंदे सेंट जॉर्ज और सेंट सेबैस्टियन के अनुयायियों में बंटे हुए हैं. दोनों के बीच फेस्टा सीज़न में आगे निकलने की ख़ूब होड़ लगती है.

माल्टा में संतों को मानने की परंपरा मध्य काल से शुरू हुई थी. यहां की संस्कृति पर अरबों की छाप भी साफ़ दिखती है. इसीलिए यहां की ज़बान में अरबी शब्द ख़ूब मिलते हैं. लेकिन, माल्टा हमेशा से ही ख़ुद को यूरोपीय देश होने का दावा करता आया है. यहां पर रोमन कैथोलिक चर्च ही हावी है.

प्रोफ़ेसर जॉर्ज कसार कहते हैं कि पीका की भावना भूमध्य सागर की परंपरा का हिस्सा है. स्पेन और इटली में भी त्यौहारों के दौरान होड़ लगती है.

इटली के सिसिली द्वीप में भी गांवों के बीच ये प्रतिद्वंदिता देखने को मिलती है.

फेस्टा सीज़न के दौरान निकलने वाली परेड में संगीत के बैंड गाते-बजाते निकलते हैं. इन्हें भी एक-दूसरे से बेहतर साबित करने का मुक़ाबला होता है.

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चर्चों का दखल

क़ूर्मी में सेंट जॉर्ज और सेंट सेबैस्टियन के बीच हुए मुक़ाबले में पिछले साल सेंट सेबैस्टियन के अनुयायियों ने बाज़ी मार ली थी. इसके अनुयायी कार्डोना बताते हैं कि उन्होंने एक लाख यूरो ख़र्च कर के फेस्टा सीज़न की तैयारी की थी. इस दौरान ख़ूब आतिशबाज़ी की गई. नाच-गाने का भी इंतज़ाम था. जश्न के दौरान ब्रिटेन के एक्स फैक्टर कार्यक्रम के विजेता बेन हेन्यू को भी परफॉर्मेंस के लिए बुलाया गया था.

कार्डोना कहते हैं, 'पीका का मतलब है कि आप अपने पड़ोसी को सजावट से लेकर जश्न तक हर मोर्चे पर पछाड़ दें. आपको ख़ुद को लगातार साबित करते रहना होगा कि आपने सबसे सुंदर सजावट की है. जश्न का आपसे बेहतर इंतज़ाम कोई और नहीं कर पाया. आपका गांव फेस्टा में अव्वल रहा.'

माल्टा, यूरोपीय यूनियन का सबसे छोटा देश है. यहां की कुल आबादी 4 लाख 30 हज़ार है. छोटे गांव और बस्तियां होने से होड़ लगाने की भावना और बढ़ जाती है.

सेंट सेबैस्टियन के बैंड क्लब के सचिव चार्ल्स सैलिबा कहते हैं, 'फेस्टा सीज़न आते ही हर कोई दिल खोल कर ख़र्च करता है. कई मामलों में माल्टा का फेस्टा सीज़न क्रिसमस से भी बड़ा होता है. इस दौरान विदेशों में रह रहे माल्टा के लोग भी अपने वतन जश्न मनाने आते हैं.'

कार्डोना कहते हैं कि, 'माल्टा के समाज में चर्च का काफ़ी दखल है. फेस्टा के दौरान तो चर्च ही इंतज़ामों की निगरानी करते हैं. वहीं बैंड क्लब नाच-गाने का इंतज़ाम देखते हैं. कई बार चर्च के पादरी गाने पसंद न आने पर अपनी पसंद के गाने भी देते हैं, ताकि उसकी धुन तैयार हो सके.'

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होड़ पर रोक की कोशिश

क़ूर्मी के रहने वाले जॉन कैमिलेरी कहते हैं, 'मेरी निजी राय ये है कि मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि किसी ने कम सजावट की है या ज़्यादा. यहां पर ये होड़ लगाने की जो भावना है यानी पीका, वो चर्चों के बीच झगड़े की देन है.'

फेस्टा सीज़न के दौरान चर्च अपनी-अपनी पसंद के संतो के अनुयायियों को मदद देते हैं. यहां तक कि वो सजावट में इस्तेमाल बल्ब की गिनती करते हैं.

2002 में माल्टा के सबसे बड़े पादरी आर्कडायोसीज़ ने इस होड़ पर रोक लगाने की कोशिश की थी. उन्हें लगता था कि इससे चर्च का अनुशासन भंग हो रहा है. लेकिन, उनकी कोशिश नाकाम रही थी. भड़काऊ चीज़ें इस्तेमाल करने पर लगाई गई रोक भी नाकाम रही थी.

जॉर्ज कसार कहते हैं, 'ये माल्टा के लिए नई बात नहीं है. कोई भी पादरी माल्टा में होड़ को काबू नहीं कर सका है और बिना अनुयायियों के चर्च की कोई औक़ात नहीं.'

राहत कि बात ये है कि पिछले कुछ दशकों में माल्टा में फेस्टा सीज़न के दौरान उत्पात कम हुआ है. जश्न शांत तरीक़े से निपट गए हैं.

इसके लिए भी माल्टा के लोग अपने संतों को श्रेय देते हैं.

(यह लेख बीबीसी ट्रैवल की कहानी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं. मूल लेख आप यहांपढ़ सकते हैं. बीबीसी ट्रैवल के दूसरे लेख आप यहां पढ़ सकते हैं.)

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