'नैकेड फ्रेंडशिप' की जापान में ख़त्म होती परंपरा

  • 11 फरवरी 2019
जापानी सार्वजनिक हम्माम, जापान, सेंटो

उगते सूरज के देश जापान में सदियों से एक परंपरा चली आ रही है.

ये परंपरा है सार्वजनिक हम्माम यानी बाथरूम में नहाने की. इन हम्मामों को जापान में सेंटो कहा जाता है.

19वीं सदी तक ये हम्माम हर शहर में बड़ी तादाद में मिलते थे.

नहाने के ये ठिकाने जापान की संस्कृति का अहम हिस्सा थे.

एक दौर ऐसा था कि ये जापान में वो ठिकाने हुआ करते थे, जहां जाकर पूरा परिवार नहा सकता था. लोग रोज़ इसके लिए सेंटो जाया करते थे.

इन हम्माम घरों की दीवारों पर ख़ूबसूरत और आंखों को सुकून देने वाली पेंटिंग की जाती थी.

लेकिन पिछली आधी सदी से जापान में सेंटो की तादाद लगातार घट रही है.

एक वक़्त में जापान में 18 हज़ार से ज़्यादा सार्वजनिक स्नानघर हुआ करते थे.

लेकिन अब इनकी संख्या घटकर महज़ तीन हज़ार रह गई है.

जब इनकी संख्या ज़्यादा थी, तो इनकी दीवारों पर चित्र उकेरने वालों की तादाद भी ख़ूब थी. हम्माम घटे, तो इन्हें सजाने वाले कलाकार भी कम होते गए.

आज की तारीख़ में जापान में इन हम्माम घरों में पेंटिंग करने वाले कुल जमा तीन कलाकार बचे हैं. इनमें से एक 83 बरस के हैं, तो दूसरे की उम्र 73 साल है.

इन दोनों के बीच 36 साल की तनाका हम्माम रंगने वाली सबसे युवा कलाकार हैं. इन्हें सेंटो मास्टर कहा जाता है. तनाका ने जापान के सामाजिक जीवन के अहम हिस्से रहे सेंटो को बचाने का बीड़ा उठाया है.

पिछले छह साल से तनाका जापान के अलग-अलग हिस्सों में जाकर इन हम्मामों की दीवारे रंगती हैं. उन पर चित्रकारी करती हैं. ताकि सदियों पुरानी इस परंपरा को बचा सकें.

तनाका के सामने सबसे बड़ी चुनौती ये होती है कि उन्हें इन स्नानघरों को एक दिन में रंगकर तैयार करना होता है. वजह ये कि ये हम्माम हफ़्ते में केवल एक बार बंद हो सकते हैं.

जहां भी तनाका को पेंटिंग करनी होती है. वो तड़के ही वहां पहुंच जाती हैं. रंग तैयार करती हैं और दिनभर में अपना काम निपटा देती हैं. वो आठ-आठ मीटर चौड़ी दीवारों पर शानदार चित्रकारी करती हैं.

किसी भी सेंटो को रंगने के लिए तनाका के पास केवल 11 घंटे होते हैं. लेकिन उन्हें पता है कि यहां नहाने आने वाले, दुनियावी तनाव दूर करने के लिए आते हैं. ऐसे में उनका मक़सद होता है कि वो दीवारों पर ऐसी चित्रकारी करें कि वो स्नान करने वालों को सुकून दें.

कब हुई सेंटों की शुरुआत?

जापान में इन सार्वजनिक हम्मामों या सेंटो की शुरुआत बौद्ध धर्म के प्रसार के साथ 700 ईस्वी में हुई थी. क्योंकि ये माना जाता है कि बुद्ध की पूजा के लिए शरीर का साफ-सुथरा होना बहुत ज़रूरी है.

ये सार्वजनिक स्नानघर आम जनता के लिए खुले थे. कोई भी पैसे देकर यहां नहा सकता था. 1200 ईस्वी में इन हम्मामों को सेंटो यानी सिक्के से स्नान करने का ठिकाना कहा जाने लगा.

टोक्यो सेंटो एसोसिएशन के मुताबिक़ सत्रहवीं सदी में टोक्यो के हर मोहल्ले में अपना हम्माम हुआ करता था. इनकी दीवारों पर क़ुदरती मंज़र उकेरे जाते थे, ताकि नहाने आए शख़्स को सुकून मिल सके.

साल 1810 के आते-आते टोक्यो में 523 हम्माम हो गए थे. लेकिन इन्हें मेइजी के राज में सबसे ज़्यादा शोहरत मिली.

साल 1868 के बाद से सेंटो में महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग नहाने के ठिकाने बनाए जाने लगे. इसके अलावा लोगों के पूरी तरह से कपड़े उतारकर नहाने की व्यवस्था भी होने लगी.

ऊंची दीवारों और पेंटिंग के दरमियान स्नान एक अलग ही तजुर्बा था. कमोबेश हर सेंटो की दीवार पर आप को जापान के सबसे चर्चित पहाड़ माउंट फुजी झांकता नज़र आएगा.

सेंटो की संस्कृति

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापान में बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य चला. इसका फ़ायदा सेंटो की संस्कृति को भी हुआ. क्योंकि जापान के घरों में अपने बाथरूम नहीं हुआ करते थे.

ऐसे में ये सार्वजनिक स्नान घर नहाने-धोने के अलावा मेल-जोल का भी ज़रिया बनते थे. दोस्तों, पड़ोसियों से गप-शप और दिमाग़ी थकान उतारने के लिए बड़ी तादादा में लोग हम्माम जाया करते थे.

साल 1968 में देश भर में 18,325 सेंटो चल रहे थे. सेंटो के बारे में कहा जाता है कि ये नैकेड फ्रेंडशिप के ठिकाने हैं.

1970 के दशक में जब जापान की अर्थव्यवस्था का विकास हुआ, तो लोगों के घरों में अपने बाथरूम बनने लगे. नतीजा ये हुआ कि सार्वजनिक हम्मामों का चलन घटने लगा. आज पूरे जापान में केवल 2600 सेंटो बचे हुए हैं.

ताईशोयू के सेंटो के मालिक मिनोरू यामाउची कहते हैं कि एक दौर में रोज़ाना 130 लोग उनके हम्माम में नहाने आते थे.

ताईशोयू का हम्माम पिछली तीन पीढ़ियों से कमोबेश वैसा ही है, जैसा मिनोरू के दादा ने खोला था. लोग यहां 380-500 येन देकर दाख़िल हो सकते हैं. इसके बाद वो आराम से गर्म पानी में नहा सकते हैं.

यहां पानी को अक्सर गैस से गर्माया जाता है. मिनोरू के सेंटो में इसके लिए लकड़ी का प्रयोग होता है.

Image caption तनाका

विरासत को सहेजने का इरादा

टोक्यो में पली-बढ़ी तनाका का इरादा कभी भी विरासत को सहेजने का नहीं था. उनके ज़माने में जापान के घरों में अपने बाथरूम होने लगे थे.

उन्हें सेंटो के बारे में तब पता चला, जब वो यूनिवर्सिटी में इतिहास पढ़ने गईं. उन्हें सेंटो के क़िस्से ने बहुत लुभाया.

साल 2004 में तनाका को पता चला कि इन सेंटो की दीवारें रंगने वाले देश में केवल दो कलाकार बचे हैं. वो दोनों ही बेहद बुज़ुर्ग हैं. तब तनाका ने इस विरासत को सहेजने की ठानी.

वो इन कलाकारों में से एक मोरियो नाकाजीमा से मिलीं, जो टोक्यो में एक पेंटिंग लगा रहे थे. तनाका ने मोरियो से पूछा कि क्या वो उन्हें अपना शागिर्द बनाएंगे.

पहले तो मोरियो ने उन्हें मना कर दिया. तब तनाका ने उन्हें समझाया कि वो नौकरी के लिए ये काम नहीं करेंगी. बल्कि वो तो इस विरासत को सहेजने में योगदान देना चाहती हैं.

आख़िरकार मोरियो, तनाका को सेंटो को रंगने और चित्र बनाने का काम सिखाने को तैयार हो गए.

उन्होंने शर्त रखी कि पेट भरने के लिए तनाका कोई दूसरी नौकरी भी कर लें. तनाका ने क़रीब 8 साल तक मोरियो की शागिर्दी में सेंटो की दीवारों को रंगने का काम सीखा.

पहले साल तो उन्होंने सिर्फ़ सामान ढोने और मोरियो को काम करते देखने में बिताया. इसके बाद तनाका मोरियो की किसी पेंटिंग के एक हिस्से को रंगने का काम करने लगीं.

छह साल की ट्रेनिंग

नीला आकाश, भूरे पहाड़ और हरा समंदर उन्हें ख़ूब अच्छे से बनाना आने लगा. लेकिन क़रीब छह साल की ट्रेनिंग के दौरान मोरियो ने कभी भी तनाका को जापान के मशहूर माउंट फुजी की तस्वीर नहीं पेंट करने दी.

मोरियो ने तनाका को बताया कि उन्होंने साल 1964 में चार कलाकारों के साथ मिलकर सेंटो की दीवारों पर कलाकृतियां बनाने का काम शुरू किया था.

1960 और 70 के दशक में मोरियो हर साल 600-800 सेंटो में पेंटिंग बनाया करते थे. लेकिन, बाद के दिनों में अगर साल में सौ सेंटो की रंगाई का काम भी मिल जाए, तो मोरियो ख़ुद को ख़ुशक़िस्मत मानते थे.

वो तो तनाका को बाद में एहसास हुआ कि कलाकृतियां उकेरने के दौरान रंगों के केमिकल शरीर पर बहुत बुरा असर डालते हैं, इसीलिए इस काम में महिलाएं नहीं आईं. वरना उनकी मां बनने की क्षमता पर असर पड़ता.

आजकल तनाका साल में 20 सेंटो में भित्तिचित्र बनाती हैं. ज्यादातर मौक़ों पर वो पुरानी पेंटिंग में ही नए रंग भरती हैं.

एक दौर था कि ये चित्र नियमित रूप से रंगे जाते थे. मगर, अब इन्हें पेंट करने वाले कलाकार ही नहीं हैं. पिछले एक दशक में ही बहुत से सेंटो बंद हो गए. उनकी जगह बस अड्डे या फिर दूसरी चीजें बन गईं.

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सेंटों में क्या क्या उकेरती हैं तनाका?

तनाका को जब भी किसी सेंटो की पेंटिंग का बुलावा आता है, तो वो उसके मालिक से मिलती हैं. उससे बात करके ये समझती हैं कि उसे अपने सेंटो की दीवारों पर चाहिए क्या. फिर वो अपने काम का सैंपल बनाकर सेंटो के मालिक को दिखाती हैं.

मालिक की रज़ामंदी मिलने पर ही वो पेंटिंग का काम शुरू करती हैं.

तनाका अक्सर इन सेंटो की दीवारों पर पहाड़, नदियां, झीलें और समंदर की लहरें उकेरती हैं. इसके अलावा वो टोक्यो के शिंतो धर्म के पूजा घरों के चित्र भी बनाती हैं. यही नहीं, तनाका अक्सर स्थानीय फलों और फूलों की तस्वीरें भी पेंटिंग में उकेर देती हैं.

सेंटो में कलाकृतियां बनाने के कुछ नियम भी हैं. अब चूंकि यहां नहाने के लिए लोग पूरे साल आते हैं. तो सीज़नल तस्वीरें जैसे बर्फ़बारी का मंज़र नहीं उकेरा जाता. इसके अलावा नदी, झीलों और पहाड़ों की तस्वीरें बनाई जाती हैं.

जापान में कमोबेश हर सेंटो में यहां के मशहूर माउंट फुजी की तस्वीर मिल जाएगी. जापानी इसे बहुत पवित्र मानते हैं. कहा जाता है कि 3776 मीटर ऊंचे इस पर्वत की तस्वीर पहली बार साल 1912 में किसी सेंटो में बनाई गई थी. तब से माउंट फुजी की बर्फ़ से ढकी चोटियां, कमोबेश हर सेंटो की दीवार पर दिखाई देती है.

माउंट फुजी और सेंटों का नाता

तनाका कहती हैं कि उनकी 90 फ़ीसद पेंटिंग में माउंट फुजी होता है. ये लोगों के रहन-सहन और सोच का अटूट हिस्सा है. वो कहती हैं कि हज़ारों बार माउंट फुजी को दीवारों पर उकेरने के बावजूद, उन्हें इसकी तस्वीर बनाना बहुत मुश्किल लगता है.

हर सेंटो मालिक ये चाहता है कि उसकी दीवार पर माउंट फुजी इस तरह दिखे, जैसा वहां से खड़े होकर सीधे देखने पर दिखेगा.

तनाका कहती हैं कि माउंट फुजी असल में लोगों की आत्मा को छूता है.

तनाका को ये नहीं पता कि सेंटो में पेंटिंग करने वाले दो बुज़ुर्ग कलाकार कब काम करना बंद कर देंगे. लेकिन, वो ये ज़रूर जानती हैं कि वो अकेले इस परंपरा को नहीं सहेज सकतीं. इसलिए वो अपने काम की खुली नुमाइश करके, लोगों को सिखाकर, इस विरासत को सहेजने में साझीदार बनाने की कोशिश करती हैं.

तनाका अक्सर वर्कशॉप में जाकर लोगों को सेंटो की दीवारों पर पेंटिंग बनाना सिखाती हैं. नई पीढ़ी के कई लोगों ने इस काम में रुचि दिखाई है.

नई पीढ़ी को पसंद आ रहे सेंटो

कभी जापान की गुरबत की याद दिलाने वाले सेंटो अब नई पीढ़ी को बहुत पसंद आ रहे हैं. युवा, अक्सर सेंटो में स्नान के लिए जाने की बातें करते हैं.

तनाका कहती हैं कि नई पीढ़ी के लोगों ने कभी सेंटो जाने का तजुर्बा ही नहीं किया. लेकिन उनकी वर्कशॉप में शामिल होने के बाद कई बच्चे जब सेंटो जाने लगे, तो तनाका को यक़ीन हो गया कि नई पीढ़ी उनकी मुहिम में ज़रूर साझीदार बनेगी.

एक बार एक वर्कशॉप के दौरान तनाका की मुलाक़ात अपने सहयोगी कोमामारू योशिकाज़ू से हुई.

जल्द ही दोनों में प्यार हो गया. अब तनाका जब भी कहीं सेंटो की पेंटिंग के लिए जाती हैं, तो कोमामुरा भी भी साथ जाते हैं. उनके लिए पेंट और ब्रश तैयार करते हैं. ताकि, तनाका तय वक़्त में काम निपटा सकें.

कोमामुरा कहते हैं कि वो गाड़ी चलाते हैं और भारी सामान उठाते हैं, ताकि तनाका की मदद हो सके.

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वो मकड़ी, जो पानी के अंदर रहती है

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