ख़ूबसूरत टापुओं का ऐसा निराशाजनक नाम कैसे पड़ा

  • 27 मार्च 2019
ट्रेवेल, डिस्अप्वाइंटमेंट आइलैंड्स इमेज कॉपीरइट Andrew Evans

जॉन बायरन का वक़्त अच्छा नहीं चल रहा था. एचएमएस डॉल्फिन नामक जहाज पर सवार उनके नाविक दल को स्कर्वी नामक रोग ने घेर लिया था. प्रशांत महासागर में धीरे-धीरे आगे बढ़ते इस जहाज पर नाविक अपने-अपने हैमॉक्स (एक तरह का झूला) में बैठे हुए थे.

दक्षिणी अटलांटिक को नियंत्रण में लेने के प्रयास में ब्रिटेन की नौसेना ने दक्षिणी अमरीका के तट पर एक ऐसे द्वीप पर नियंत्रण पाने का काम एडमिरल बाइरन को दिया था जहां जहाजों पर कुमुक और रसद लादी जा सके और फिर बाद में ईस्ट इंडीज़ के लिए एक वैकल्पिक रास्ता ढूंढा जा सके.

अपनी यात्रा के अन्त में इंग्लैंड पहुंचने पर उन्होंने दो वर्ष से कम समय में पूरी दुनिया का चक्कर लगाने का रिकॉर्ड स्थापित करने के साथ-साथ पश्चिमी फॉकलैंड द्वीपों को साम्राज्य में मिलाने और ग्रेट ब्रिटेन तथा स्पेन के बीच एक युद्ध को भी आमंत्रण देने का काम किया था.

बायरन ने अपने जहाज आगे बढ़ा दिए, और उनकी हताशा दुनिया के मानचित्र पर इन द्वीपों के एक नए नामकरण के रूप में प्रकट हुई - 'आइलैंड्स ऑफ डिस्अप्वाइंटमेंट'

दक्षिण अमरीका के अंतिम छोर को पार करने के बाद बायरन का सामना दुनिया के सबसे बड़े महासागर- प्रशांत महासागर से हुआ. एक महीने तक नीले क्षितिज को घूरते रहने के बाद सामने एक छोटा सा द्वीप नजर आया.

7 जून 1765, शुक्रवार के दिन बायरन ने बड़ी खुशी से इस द्वीप की सुंदरता का बखान किया.

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नाविक दल भी किसी तरह रेंगकर डेक पर आ पहुंचा. नारियल के पेड़ों को देखकर चारों ओर खुशी दिख रही थी. लेकिन जल्दी ही बाइरन को एहसास हुआ कि यहां उतरना लगभग असंभव है. अपने नोट में उन्होंने लिखा, "मैं जहाज पर खड़े होकर द्वीप के पास भी नहीं रुक सकता था."

लहरें तेज थीं और मूंगा चट्टानों से भरा तट अचानक डूबती गहराई में खो जाता था. यहां तो लंगर भी नहीं डाला जा सकता था.

ऊपर से टापू पर रहने वाले स्थानीय लोग अपने पांच मीटर बरछों को लहराते हुए बायरन और उसके साथियों को धमका रहे थे.

बायरन ने इसका ज़िक्र करते हुए लिखा, "तट के करीब जाना भी खतरे से खाली नहीं था. वे हमें मार डालेंगे. उनकी चीखें और हाथों में समुद्र तट से उठाए बड़े पत्थर खतरनाक लग रहे थे."

स्थानीय लोगों को मनाने की कोशिश में इन अंग्रेजों ने उनको अपने पास पड़ी हुई ब्रेड का लालच दिया लेकिन यह काम नहीं आया और उन लोगों ने बाइरन की भेजी हुई नाविकों से भरी नाव कब्जे में करने की कोशिश की.

मन मसोस कर बायरन ने जहाज वापस मोड़ लिया और पास के बड़े टापू की ओर बढ़ने लगे. लेकिन यहां भी लंगर डालने में उन्हें सफलता नहीं मिली. ऊपर से स्थानीय लोग भी समुद्र में पीछा कर रहे थे. वे तभी माने जब तोप का एक गोला उनकी ओर छोड़ा गया.

इस स्थान पर पहुंचने के 20 घंटे के भीतर ही बायरन ने अपने जहाज आगे बढ़ा दिए, और उनकी हताशा दुनिया के मानचित्र पर इन द्वीपों के एक नए नामकरण के रूप में प्रकट हुई - 'आइलैंड्स ऑफ डिस्अप्वाइंटमेंट'. उनकी समुद्री यात्रा पूर्ण होने के बाद एक नक्शा प्रकाशित किया गया और तब से यह नाम ऐसे ही चल रहा है.

द्वीप जहां कोई पर्यटन उद्योग नहीं

एक रात जब मुझे नींद नहीं आ रही थी तो बायरन के नोट में ये नाम देखकर मुझे बड़ी तेज हंसी आई. फिर तो पूरी रात मैंने नोट खत्म करने में बिता दी. 'डिस्अप्वाइंटमेंट आइलैंड्स' किसी असली टापू का नाम न होकर टिनटिन कॉमिक का नाम लग रहा था. लेकिन ऑनलाइन पता करने पर ये द्वीप दक्षिणी प्रशांत के टुआमोटू द्वीप समूह के जुड़वा द्वीपों नापुका और टेपोटो की ओर इशारा करते थे. यह द्वीप समूह पृथ्वी के सबसे बड़े मूंगा प्रवालद्वीप समूह हैं.

गूगल अर्थ की मदद से पता चला कि 'डिस्अप्वाइंटमेंट आइलैंड्स' महासागर में तैरते एक कोशिका वाले किसी जीव की तरह हैं. फ्रेंच पॉलीनेशिया के 118 द्वीपों और प्रवालद्वीपों में केवल 4 वर्ग किलोमीटर में फैला टेपोटो एक सबसे छोटा द्वीप है. बाइरन यहीं पर उतरने में नाकाम रहे थे. क्या मैं यहां पहुंच पाऊंगा या मेरा भी वही हश्र होगा जैसा बाइरन का हुआ?

कोई होटल नहीं, कोई रेस्तराँ नहीं, कोई पर्यटन उद्योग नहीं - मुझे तो ये जन्नत जैसा लग रहा था

बायरन के उस प्रयास के 254 साल बाद 'डिस्अप्वाइंटमेंट आइलैंड्स' तक पहुंचना मुश्किल ही साबित हुआ. पास के बड़े नापुका प्रवालद्वीप तक जाने वाली उड़ानों का ज़िक्र एयर टाहिती की अन्तर्राष्ट्रीय वेबसाइट पर भी नहीं मिलता. एजेन्ट तक पहुंचने से पहले मुझे तीन हफ्ते तलाश में बिताना पड़ा.

कुल मिलाकर मुझे समझाया गया कि नापुका तक फरवरी में उड़ान भरी जा सकती है लेकिन फिर एक महीने के लिए रुकना पड़ेगा. इसलिए मैंने मई के अच्छे मौसम में वहां की यात्रा मुनासिब समझी. फिर भी मुझे 8 दिन तो रुकना ही पड़ा. टाहिती की राजधानी पापीते से लगभग 1000 किलोमीटर दूर बसा नापुका फ्रेंच पॉलीनेशिया का एक सबसे निर्जन टापू है.

मेरी मित्र सेलेस्टे ब्रैश ने मुझे समझाया था कि वहां रुकने का इंतजाम पहले से कर लेना. वह कभी नापुका नहीं गयी थी लेकिन लोनली प्लैनेट की टाहिती ऐंड फ्रेंच पॉलीनेशिया की गाइडबुक की लेखिका के रूप में उसने अनुभव के तौर पर बताया कि टुआमोटू के बाशिंदे सैलानियों के आने का अनुभव नहीं जानते.

एक सैलानी के रूप में यही तो मेरी इच्छा थी- उन पुराने ब्रिटिश नागरिकों की तरह अचानक किसी टापू पर पहुंचकर सही मायनों में उसकी खोज करना. लेकिन मैंने लम्बी समुद्री यात्रा और स्कर्वी जैसे रोग का दामन छोड़ते हुए वाशिंगटन डीसी से टाहिती तक की 18 घंटे की यात्रा करना ज्यादा उचित समझा. पापीते में रात बिताने के बाद मैंने नापुका के लिए दो घंटे की हवाई यात्रा का सहारा लिया.

यात्रा के पहले घंटे में अथाह समुद्र की विरानियां थीं. पानी की मात्रा के साथ-साथ उसका नीलापन भी मुझे चकित कर रहा था. माना जाता है कि पॉलीनेशिया के टापू इंसान द्वारा बसाए गए अंतिम जगहों में से एक हैं. इंडोनेशिया और फिलीपींस के लोग अपनी पतली नावों में यहां कैसे आये होंगे, सोचकर ही रोमांच से भर आता है. दरअसल, पॉलीनेशिया जमीन से कहीं अधिक महासागर जैसा दिखता है.

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तभी नज़रों के सामने मूंगा प्रवालद्वीपों की सफेद धूमिल छवि उभरी. इन्हें टुआमोटू के निचले द्वीप भी कहा जाता है. चक्कर लगाते हुए हमारा हवाई जहाज फकारावा प्रवालद्वीप पर उतरा, जहां 20 यात्री विमान से उतर गए. 10 मिनट बाद हम हवा में थे.

एक घंटा हवा में बिताने के बाद मैंने टेपोटो को पहचान ही लिया. अकेला महासागर के एकांत में एक बिंदु जैसा. विमान नापुका के बड़े प्रवालद्वीप की ओर झुका.

वहां उतरने से पहले मुझे अचानक कुछ धातुई छतें, कुछ कच्ची सड़कें और आसमान की ओर उठने वाले गिरजाघर का नुकीला शिखर दिखाई दिया.

विमान से उतरते ही मेरा स्वागत नमी से भरी गर्म हवाओं ने किया. बचने के लिए मैं नापुका एयरपोर्ट की छाया की ओर दौड़ पड़ा. वहां देखकर ऐसा लगा कि पूरा द्वीप ही विमान का स्वागत करने पहुंच गया था. लोग अपने परिचितों का गर्मजोशी से स्वागत कर रहे थे. मैं अकेला विदेशी था और बड़े ही दयनीय ढंग से सब कुछ देख रहा था. हालांकि मैं 12000 किलोमीटर तय करके आया था लेकिन खाई पटी नहीं थी. यहां हर व्यक्ति जानता था कि मैं यहां का नहीं हूं.

एक युवा ने मुझसे फ्रांसीसी भाषा में पूछा, "आप यहां छुट्टी मनाने आए हैं?"

मुस्कुराकर मैंने फ्रांसीसी में ही हामी भरी. पूरी बात बताने से अच्छा केवल हां करना था.

बातचीत में पता चला कि उसका नाम जैक है और वह तथा उसका साथी इवारी टाहिती में इलैक्ट्रॉनिक टेक्नीशियन हैं जो फ्रेंच पॉलीनेशिया में लगे सुनामी की चेतावनी देने वाले सायरनों की मरम्मत करते हैं.

वे टेपोटो में लगे साइरन को ठीक करने आये थे जहां नापुका से केवल नाव द्वारा पहुंचा जा सकता था. मेरी तरह उन्हें भी अगली उड़ान से पहले यहां 8 दिन रुकना पड़ेगा. जैक ने पूछा कि आप यहां क्यों आये हैं? उसने यह भी बताया कि न तो यहां रहने की जगह है और न ही कोई अन्य सेवा मिलती है.

इवारी को मेरी उपस्थिति अजीब लग रही थी.

उसने जानना चाहा कि क्या मैं अक्सर ऐसा ही करता हूं और बिना कोई योजना बनाए कहीं भी पहुंच जाता हूं. मेरे कुछ बोलने से पहले ही जैक टपक पड़ा.

"मैं मेयर से बात करूंगा, कुछ इंतजाम हो जाएगा."

अचानक एक स्थानीय महिला वहीं की पोशाक में मेरे सामने आ खड़ी हुई. उसका नाम मरीना था और 300 की आबादी वाले इस प्रवालद्वीप की वह तवाना यानी टाहिती में मेयर थी. नापुका पर होने वाली हर बात की जिम्मेदारी उसकी थी.

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तवाना मरीना ने सवाल दागने शुरू किए, "आपने हमें क्यों नहीं बताया कि आप आ रहे हैं? हमने तो कोई इंतजाम नहीं कर रखा है!"

मैंने किसी तरह बताया कि मैं बोझ नहीं बनाना चाह रहा था.

"क्या आप टेपोटो की यात्रा करने चाहते हैं?" तवाना मरीना ने फिर पूछा था क्योंकि टेक्नीशियनों को ले जाने के लिए एक नाव का प्रबंध किया जा चुका था. मैंने अवसर लपक लिया.

जैक ने मुस्कुराते हुए साथ आने का आमंत्रण दिया जबकि इवारी की सांस फूल गई.

मेरे जरा से सामान को देखते हुए इवारी ने सावधान किया कि वहां पानी नहीं मिलता. लेकिन मैंने तो पूरी विकीपीडिया याद कर ली थी. मुझे सब पता था. बैग में कुछ लीटर पानी भी भरा था. लेकिन यह एक हफ्ते के लिए नहीं केवल एक दिन के लिए था.

जैक ने कहा, "हम बांट लेंगे."

हम तवाना मरीना के ट्रक में सवार होकर नाव की ओर निकल पड़े. पलक झपकते ही हम नाव में सवार थे और हमारी नाव तेज आवाज़ के साथ लहरों की छाती चीरने लगी.

टेपोटो पर जब मैं पहुंचा

चट्टानों से दूर निकलकर समंदर कुछ शांत था. लेकिन हमारी नाव को नापुका से उत्तर पश्चिम की ओर धकेलती लहरें लगातार उठ रही थीं. नाव के इंजनों का शोर समुद्र के सन्नाटे को भंग कर रहा था. पानी में अपने आपको इतना असहाय कभी नहीं पाया था. यात्रा में कोई ओर-छोर नहीं दिख रहा था और सवारी जरा सी थी. नापुका पीछे छूट चुका था और चारों ओर नीला समंदर पसरा पड़ा था.

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फिर भी दिल में कहीं अपने पॉलीनेशियाई नाविक सहयोगियों के प्रति गहरा विश्वास था. मैंने अपना जीवन इनके हवाले कर दिया था. मैं देख रहा था कि ये लोग समुद्र की बदलती लहरों को सड़क पर लगे साइन बोर्ड के संकेतों की तरह पड़ रहे थे. क्षितिज पर टिकी उनकी नजरें उनकी उंगलियों को संकेत दे रही थीं. इधर-उधर घुमाते वे नाव को तेजी से आगे बढ़ाते जा रहे थे. मंजिल एक इतना छोटा द्वीप था जो पलक झपकते ही गायब हो जाए.

20 मिनट और लगभग 10 किलोमीटर की समुद्री यात्रा के बाद अचानक जमीन की एक हरी पतली पट्टी पानी से उभरी. कुछ देर में सफेद बलुआ तट भी नज़र आ गया. 20 मिनट और बीतने के बाद पूरा द्वीप सामने था. बाइरन ने नारियल के पेड़ों के बारे में उस समय एकदम सही लिखा था.

एडमिरल बाइरन के विपरीत मैं कामयाबी से टेपोटो पर उतर गया था. उठती-गिरती लहरों से सामंजस्य बिठाकर मैं यहां उतर आया था. साथ ही नाव को समुद्र से उठाकर तट पर कर लिया गया था. यहां की स्थिति देखकर 18वीं सदी की वह परिस्थिति भी सहज ही समझ आ गई जिसमें ब्रिटेन का एक बड़ा जहाज यहां लंगर नहीं डाल पाया था. दरअसल, यह टापू नुकीली और कम गहराई वाली चट्टानों से घिरा हुआ था जिससे आगे समुद्र की नीली गहराई थी, जैसा कि बाइरन ने अपने नोट में लिखा था.

मेरा स्वागत 40 की उम्र के आसपास पहुंच चुके स्थानीय निवासी सेवेरो ने किया जो इस द्वीप का एकमात्र पुलिस वाला था. सेवेरो नापुका की तवाना मरीना का बेटा था. उसने सेवेरो को बताया था कि मैं पहुंचने वाला हूं. इसी वजह से टापू के कई बाशिंदे हमारा स्वागत करने आ पहुंचे थे.

इनकी अगुआई लुआना नाम की स्थानीय महिला कर रही थी जिसने मेरे दोनों गालों को चूमकर 'बायेनवेन्यू' कहते हुए मेरा स्वागत किया. मैंने बी टाहिती भाषा में 'माउरूरू' कहते हुए शुक्रिया अदा किया.

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लुआना टेपोटो की तवाना थी. उसने हमें इस द्वीप की एकमात्र सड़क का रास्ता दिखाया.

मेरे बगल में चलते हुए एक लड़के ने मुझसे फ्रांसीसी में पूछा, "क्या आपने कभी चार सिर वाला नारियल का पेड़ देखा है?"

मैंने कहा, "नहीं, नहीं देखा है."

क्या आपने कभी चार सिर वाला नारियल का पेड़ देखा है?

एक बड़े लड़के ने बताया, "हमारे यहां है, चार सिर वाला नारियल का पेड़."

अब तो इस नारियल के पेड़ से संबंधित कहानियां दबी आवाज़ में मेरे कान में पहुंचने लगीं. पहले ये पेड़ सात सिरों वाला था, फिर बहुत पहले एक तूफान ने इसके तीन सिर गिरा दिये और अब यह चार सिर वाला अजूबा था.

'डिस्अप्वाइंटमेंट आइलैंड्स' पर बिना पानी या योजना के पहुंचने के दो घंटे के बाद मुझे टेक्नीशियनों के साथ एक अस्थायी आवास उपलब्ध करा दिया गया था. प्लाइवुड से बनी दीवारों और लाल नारंगी छपे हुए पर्दों वाले इस घर में मैं बिस्तर पर बैठा, गर्मी से निपटने की कोशिश में लगा हुआ था. न केवल मैं टेपोटो पर उतरने में कामयाब रहा था बल्कि मेरा स्वागत भी हुआ था.

40 लोगों की आबादी वाला द्वीप

कुछ ही मिनटों में स्कूटर पर सवार सेवेरो पत्नी टुटापू के हाथ का बना लंच यानी दोपहर का भोजन आ पहुंचा था. तले हुए चावल और मटर के साथ-साथ नारियल की रोटी भी थी. मछली का व्यंजन ताजी मछलियों से बनाया गया था और वह बहुत स्वादिष्ट था.

जब हम भोजन कर रहे थे तो सेवेरो ने मुझे समझाना शुरू किया. द्वीप के पुलिस वाले के रूप में उसका काम यहां के कुछ दर्जन लोगों में शांति बनाए रखना और उनकी देखभाल करना था.

उसने मुझे बताया, "यहां बहुत शांति है और कोई भी समस्या नहीं है. पिछले 20 साल से अधिक समय से मैं यहां हूं और आज तक मेरी याद में यहां कोई सैलानी नहीं आया." मुझे ऐसा लगा कि वह मेरी असल नीयत जानने की कोशिश कर रहा था.

दरअसल, सेवेरो ने मुझे बताया कि यहां लोगों से बात करने पर किसी को भी यह याद नहीं आया कि पिछली बार टेपोटो तक पहुंचने वाला गैर पॉलीनेशियाई कौन था. फिर बताया गया कि इस द्वीप पर 62 लोग नहीं बल्कि अब केवल 40 लोग हैं जिनमें से 13 तो बच्चे हैं जिनकी उम्र 12 साल से कम है.

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बताया यह गया कि युवा लोगों को 12 वर्ष की अवस्था के बाद फ्रांसीसी सरकार टुआमोटू द्वीप समूह के 390 किलोमीटर दूर स्थित एक अन्य प्रवालद्वीप हाओ में स्थित बोर्डिंग स्कूल में भेज देती है. हाईस्कूल के लिए किशोर टाहिती के मुख्य द्वीप पर चले जाते हैं. सेवेरो नापुका में पले-बढ़े थे और फिर हाईस्कूल के लिए टाहिती लौट गए थे. उसके बाद उन्होंने टेपोटो की एक लड़की से शादी कर लिया और यहां आ गए.

सेवेरो ने पूछा, "यहां तुम करोगे क्या?"

मैंने जवाब दिया, "खोज." हालांकि, मैंने अभी कुछ योजना तो बनाई ही नहीं थी. मेरा पूरा दिमाग तो यहां तक पहुंचने की उधेड़बुन में ही लगा था.

उसने मुझे सलाह दी, "गर्मी कम होने तक इंतजार करो."

पूरी दोपहर मैंने ऊंघते हुए बिताई. आवाज़ के नाम पर केवल मेरी सांसों की ध्वनि थी जो लहरों और हिलोर लेते नारियल के पेड़ों से ताल मिला रही थी. शाम चार बजे मुझे सड़के के उस पार होने वाली घंटी की आवाज़ ने खींचा. यहां द्वीप के अधिकतर लोग मालाओं से ढंके एक पूजास्थल की ओर मुंह करके बैठे हुए थे. एक शख्स गिटार बजा रहा था, जबकि द्वीप पर तैनात सिस्टर प्रार्थना में इनकी अगुआई कर रही थी.

गाती हुई एक महिला ने अपनी बेंच पर मुझे जगह दी. इसाईयों की यह प्रार्थना सभा एक घंटे तक चली. सारी प्रार्थनाएं और स्तुतियां टाहिती भाषा में थीं. बाद में उस महिला ने मुझे बताया कि यह पवित्र सप्ताह चल रहा है जिसमें सारे द्वीपवासी वर्जिन मेरी के समक्ष दिन में दो बार प्रार्थना करते हैं.

महिला का कहना था, "टेपोटो पर हम लोग भाग्यशाली हैं क्योंकि न तो यहां कोई युद्ध है, न अपराध हैं." हाथ में कागज से सिगरेट बनाते हुए उसने सोचते हुए कहा, यहां कोई भी समस्या नहीं है. यह भी बताया गया कि यहां नल का पानी या इंटरनेट नहीं है और बिजली की आपूर्ति भी बहुत सीमित है.

वर्ष 1995 में टेपोटो में पहले सोलर पैनल लगे थे और बिजली आई थी. मोबाइल टावर पिछले पांच सालों में लगे हैं.

फिर अचानक सवाल दागा गया, "क्या तुमने कभी चार सिर वाला कोई नारियल का पेड़ देखा है?"

"नहीं, मैंने नहीं देखा है."

एक अजीब सी रहस्य भरी आवाज़ में उसने कहा, "हमारे इस द्वीप पर एक है, दुनिया का शायद इकलौता ऐसा पेड़."

जल्दी ही रात हो गई और आसमान सितारों से भर गया. ऊपर आकाशगंगा मुझे लुभा रही थी और ऐसा लग रहा था कि ऐसा आकाश मैंने पहली बार देखा है.

मेरी सुबह घंटी की आवाज के साथ हुई. द्वीपवासियों को एक बार फिर प्रार्थना के लिए बुलाया जा रहा था. लेकिन आज मैंने वहां न जाने का फैसला किया और एक सड़क के छोर पर जाकर मैं तट की तरफ निकल गया. उगता सूरज मेरे पीछे समुद्र को सुनहरा बना रहा था. मैं टापू पर दक्षिण की ओर बढ़ता हुआ 2.6 किलोमीटर की लम्बाई तय करने में लगा था. तट के केकड़े और हरी मछलियां मेरा मन मोह रही थी. सुंदरता बिखरी पड़ी थी.

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Image caption चार सिर वाला नारियल का पेड़

द्वीप की प्रमुख दिशाओं में बड़े-बड़े सफेद पत्थरों के क्रॉस बने हुए थे. समुद्री तट का वह किनारा बाहरी दुनिया की चीजों से भरा पड़ा था. व्हिस्की की बोतल, चीन की दवाईयां, टूटा हुआ सीडी केस, जापान का सलाद पर छिड़का जाने वाला मिश्रण इत्यादि. मैं सोच रहा था, ये चीज़ें आख़िर कहां से आई होंगी- एशिया, अमरीका या फिर न्यूजीलैंड.

अपने तीन दशकों के यात्रा जीवन में मैंने इतना एकाकी और अनछुई जगह नहीं देखी. ऐसा लगता था कि बाइरन के ज़माने से ही ये टापू ज्यों का त्यों है. पुराने मानचित्रों पर इस टापू को देखकर मैं किसी तरह यहां पहुंच भी गया था लेकिन अब भी यह यात्रा असंभव ही लग रही थी. लग रहा था जैसे मैं सपना देख रहा हूं.

कुछ ही दिनों में मैं भी इस द्वीप की सादगी में रच-बस गया. यहां के निवासियों की तरह ही खाना-पीना और सोना मेरा जीवन बन गया. स्नान भी बारिश के पानी से हो रहा था. पेड़ की छाया तले मेरे और यहां के निवासियों के बीच कहानियों का दौर आम हो चला था. कभी-कभी बहुत प्यास लगती थी लेकिन मैं चुप रहता था. पता नहीं कैसे द्वीपवासियों को एहसास हो जाता था कि मैं प्यासा हूं और वे अपने बच्चों को ताजा नारियल तोड़कर मेरे सामने उसे काटकर मुझे पानी देते थे. मैं इसका दाम भी चुकाने को तत्पर रहता था लेकिन वे हमेशा मना कर देते थे. दरअसल, इस दौरान धन का प्रयोग केवल तब हुआ जब मुझे सेवेरो को कमरे और रहने का किराया देना पड़ा.

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इस छोटे से द्वीप में यह खबर फैल चुकी थी कि एक विदेशी आ पहुंचा है और पास वाले गुलाबी बंगले में रह रहा है. कभी-कभी शाम के वक्त कुछ लोग मुझसे हैलो कहते हुए मुझे टापू घुमाने के लिए भी कहते थे या फिर कुछ सवाल पूछते थे. जैसे "आपके अपने शहर में आपके कितने घर हैं?" "क्या आप इसाई हैं?" कभी-कभी इधर-उधर घूमते-टहलते मुझे नारियल के पेड़ों के पीछे से घूरती आंखें दिख जाती थीं.

उन्हें मालूम था कि मैं पुलिस वाले की देखरेख में हूं फिर भी वे हमेशा चौकन्ने रहते थे. मैंने भी पूरी तरह खुलापन बनाए रखा.

जब काफी गर्मी सताती थी तो मैं समुद्र में तैरने निकल जाता था जबकि टेपोटो के लोग तट से ही मुझे देखते रहते थे. आंखों पर चश्मा लगाए मैंने समुद्र की गहराईयों में फलते-फूलते जीवन का भी आनन्द उठाया. सब कुछ पूरी तरह अनछुआ और अपने मूलरूप में यहां संरक्षित था.

शायद बायरन की निराशा ने इस जगह को बाकी दुनिया से बचाकर आज तक संरक्षित रखा था. बोराबोरा और टाहिती की मूंगा चट्टानों को भी मैंने कुछ हद तक प्रभावित होते देखा था लेकिन उनकी तुलना में टेपोटो पूरी तरह से दाग मुक्त था. ये सब निहारकर मैं अपने आप को भाग्यशाली मान रहा था.

मुझे पता था कि लाखों सैलानी पॉलीनेशिया की यात्रा पर आएंगे लेकिन न तो उन्हें ये अनछुई चट्टानों के दर्शन होंगे और न ही चार सिर वाले नारियल के पेड़ के. कई दिनों तक उम्मीद रखने के बाद मुझे तीन स्कूली बच्चों ने अपना निजी निमंत्रण भेजा. इनके नाम थे- टुआता, टिरोहा और सिल्वेन. ये लोग मुझे मेयर के कार्यालय तक ले आए जहां टेक्नीशियन सुनामी वॉर्निंग सिग्नल पर अपना काम समाप्त करने में लगे थे.

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हमारे खोज अभियान की सेवा में द्वीप पर मौजूद एकमात्र वाहन, जो कि ट्रैक्टरनुमा था, उसे लगाया गया था. इसे चलाने वाले सिल्वेन के पिता आंद्रे थे. टेक्नीशियनों के साथ मैं अंदर बैठा था. कुल मिलाकर इस छोटे से ट्रैक्टर पर हम आठ लोग सवारी कर रहे थे.

नारियल टेपोटो पर उगने वाली एकमात्र नकदी फसल है. जंगल में आगे बढ़ते हुए मैंने रास्ते में नारियलों के बड़े ढ़ेर देखे. इनके अच्छे दाम मिलते हैं. महीने में एक बार इन्हें लादकर ले जाया जाता है. हर निवासी नारियल इकट्ठा कर इसके अंदर की सफेद गिरी जिसे कोपरा कहते हैं, को नकद के बदले बेच सकता था. लेकिन आंद्रे का कहना था कि नारियल के पेड़ अब मरने लगे हैं. गुबरैले की एक प्रजाति इन्हें खत्म कर रही है.

20 मिनट तक नारियलों के बीच से गुजरने के बाद ट्रैक्टर रुक गया. मैंने नज़रें उठाईं तो देखा कि चार सिर वाला नारियल का पेड़ हवा में हिलोरे ले रहा था.

टिरोहा ने चिल्लाकर इस खुशखबरी को सार्वजनिक किया. मैं भी सन्न खड़ा कुदरत के इस करिश्मे को देख रहा था. अब तक इसकी कहानी द्वीप के हर निवासी ने हर तरह से मुझे बता दी थी. सात सिर से चार सिर वाला यह नारियल का पेड़ कैसे तूफान की मार झेलकर भी खड़ा था. पहले तो द्वीप के निवासी तूफान आने पर किसी नारियल के पेड़ को पकड़कर खड़े हो जाते थे जिससे उड़ने से बच सकें. लेकिन अब सैकड़ों किलोमीटर दूर से ही तूफान की चेतावनी का संकेत दे दिया जाता था और उससे बचने के लिए पत्थरों से बना गिरजाघर था ही.

वापसी में हमने लम्बा रास्ता चुना. तट के किनारे-किनारे हम गुलाबी सूर्यास्त का आनन्द लेते हुए उस ओर पहुंचे जहां मेरे ही कदमों के निशान मुझे दिख रहे थे. बाइरन की तरह ही मैंने भी टेपोटो पर अपना निशान छोड़ दिया था.

आंद्रे ने अपने फिरोज़ी रंग के बंगले के सामने ट्रैक्टर रोककर सबको नारियल का ताजा पानी पिलाया.

उस रात आंद्रे, सेवेरो और टेपोटो के बहुत सारे आदमी हमारे गुलाबी मकान के सामने इकट्ठा होकर बियर का आनन्द ले रहे थे. कहानियों का दौर फ्रांसीसी, टाहिती और स्थानीय टुआमोटू भाषा में चल रहा था. भोजन में दिन के भोजन के साथ-साथ प्याज और नारियल के दूध की भी सौगात थी.

टेपोटो पर अपने निवास के आखिरी दो दिनों में मैंने टुआटा और टिरोहा को शतरंज खेलना सिखाया. स्कूल में शतरंज का बोर्ड तो था लेकिन किसी को मालूम नहीं था कि खेला कैसे जाए. उस रात इवारी ने मुझे खेलने की चुनौती दी और खेलते-खेलते मुझे हराने की कगार पर पहुंचा दिया.

लेकिन जैक की मदद से मैं बच निकला और मैच बराबरी पर छूट गया.

नापुका की यात्रा

अगली सुबह उन लोगों ने नाव को लहरों पर छोड़ दिया. सेवेरो के सास-ससुर भी हमारे साथ आ रहे थे. बीच-बीच में वे लोग नापुका की यात्रा करते रहते थे.

तवाना लुआना ने विदाई देते हुए कौड़ियों की एक माला मेरे गले में डालकर कहा, "आपका यहां हमेशा स्वागत है."

ऐसी ही विदाई सेवेरो ने भी दी. आंद्रे और अन्य ने भी अपने-अपने हार गले में डाल दिए. नाव में पहुंचते-पहुंचते मेरी गर्दन इन कौड़ियों के हार के भार से दबने लगी थी. पांच मिनट बाद हमारी नाव टेपोटो को पीछे छोड़ चुकी थी.

मैंने नापुका पर तीन दिन और बिताये. 200 लोगों के इस शहर में अचानक ऐसा लगा शोर बढ़ गया हो. सेवेरो की सास ने चेतावनी देते हुए कहा, "टेपोटो पर हम अपने दरवाजों में ताला नहीं लगाते, लेकिन नापुका में उन्हें बंद करना पड़ता है."

टेपोटो से अलग यहां कारें भी थीं और कम से कम तीन सड़कें तो थीं ही.

नापुका पर मेरा मार्गदर्शन द्वीप का फायरमैन यानी अग्निशमन कर्मचारी कर रहा था. उसका नाम उसकी चौड़ी और मांसपेशियों से भरी छाती पर गुदा हुआ था. नाम था- मरामा.

द्वीप पर उतरने के एक घंटे के भीतर ही मरामा ने मुझे कच्ची सीपी खाने के लिए कहा. मुझे यह एक परीक्षा सी लगी, जिसे किसी तरह मैंने पास कर लिया. इसे देखकर उसने कहा कि मैंने यह दिखा दिया है कि मैं उन लोगों का सम्मान करता हूं.

मैं उनका सम्मान तो करता था लेकिन टेपोटो पर जहां मैंने सीपी की परत खोलकर उसे हर तरह से खाया था.

मरामा ने मुझे बताया कि नापुका टापू पर एक परिषद है जो सीपियों और नारियलों को इकट्ठा करने पर ध्यान रखती है और वह उस परिषद का सदस्य है. उसका काम सीपियों और नारियलों की आबादी को लगातार बनाए रखना है.

जब हम वापस आ रहे थे तो मरामा ने मुझसे पूछा कि नापुका के बारे में मैंने कैसे सुना? जब मैंने बताया कि इन द्वीपों के बारे में मैंने एक बहुत पुरानी पुस्तक में पढ़ा था जो बाइरन ने लिखी थी.

बाइरन का नाम सुनकर मरामा का मुंह बन गया था. मैंने उसे बताया कि बाइरन वर्ष 1765 में यहां आया था.

तब मरामा ने कहा कि इन द्वीपों का नाम 'डिस्अप्वाइंटमेंट आइलैंड्स' रखे जाने से यहां के लोग बाइरन से खुश नहीं हैं. उसने मुझसे कहा कि लोग यहां आएंगे तभी समझेंगे और मुझे यहां के बारे में लोगों को बताना चाहिए. मैंने भी स्पष्ट किया कि यहां आकर मुझे समझ आ गया है कि बाइरन गलत थे.

मैं जिस माहौल में था, उसमें निराश होना असंभव था. सब कुछ स्वप्न लोक जैसा लग रहा था.

वर्ष 1947 में नार्वे के थोर हायरडाल की अगुआई में खोजकर्ताओं का एक समूह गलती से यहां आ लगा था. उसके बाद से यहां पहुंचने वाला मैं पहला विदेशी था.

जब मैंने वहां से विदा लिया तो मरामा ने एक भाई की तरह मुझे विदा किया. मैंने भी अपनी काउब्वॉय हैट उतारकर उसे तोहफा दे दिया.

उस खूबसूरत जगह से वापसी

टाहिती वापस आने में फिर से वही चक्कर लगाने पड़े. वापस आकर सब कुछ बहुत शोर-शराबे भरा लग रहा था. मैंने अपने पास नापुका और टेपोटो की अनगिनत तस्वीरों का खजाना इकट्ठा कर लिया था. लेकिन इस संबंध में मैं पेशेवर राय लेना चाह रहा था.

टुआमोटू द्वीपों से संबंधित प्रत्येक चीज़ को संरक्षित करने के लिए जिम्मेदार ज़्याँ कापे बताते हैं कि बाइरन की कहानी एकमात्र वो दर्ज कहानी है जिसमें यूरोपीय लोग स्थानीयों से सम्पर्क साधने में नाकाम रहे थे. नापुका में कापे के भाई से मेरी मुलाकात के बाद कापे से मुलाकात हुई थी.

कापे के अनुसार बाइरन की निराशा गलत है क्योंकि वह आधारहीन है.

हालांकि, बाइरन की विफलता शायद बहुत बड़ी घटना रही हो, लेकिन उससे दक्षिणी प्रशांत के अन्य द्वीपों की तरह बर्बाद होने से नापुका बच गया.

कापे कहते हैं कि नापुका और टेपोटो टुआमोटू द्वीप समूह के वे बचे हुए द्वीप हैं जहां सब कुछ मूल रूप में देख सकते हैं. वे बताते हैं कि स्वागत करना तो पॉलीनेशियाई लोगों के लिए बहुत पवित्र है. यही मानवता की आत्मा भी है.

लेकिन इतिहास में विदेशियों के हाथ में ही कलम रही, इसलिए इस जगह का नाम 'डिस्अप्वाइंटमेंट आइलैंड्स' दे दिया गया. वे बताते हैं कि नापुका और टेपोटो भी केवल निकनेम यानी उपनाम हैं. इन द्वीपों की असली कहानी तो उनके असली नामों में है.

मैं ये बनावटीपन नहीं दिखा सकता कि मैं सब कुछ अच्छी तरह समझता हूं या इतने खूबसूरत और जटिल इतिहास को आप तक पहुंचा सकूं.

कापे और मैं घंटों तक बात करते रहे. उन्होंने कई बार मुझे इन द्वीपों के कई पॉलीनेशियाई नामों के अर्थ बताने की कोशिश की. जैसे- टे पुका रूंगा "द ट्री व्हेयर द सन राइज़ेज़ (नापुका)"; और टे पुका रारो, "द ट्री व्हेयर द सन सेट्स (टेपोटो)".

इन नामों मे ही सदियों पुरानी कहानियों और यहां के मूल निवासियों तथा उनके विश्व दर्शन के बारे में पता चलता है.

ध्यान से सुनते हुए मैंने सब कुछ अपने मस्तिष्क में हमेशा के लिए ज़ब्त कर लिया लेकिन मैं ये बनावटीपन नहीं दिखा सकता कि मैं सब कुछ अच्छी तरह समझता हूं या इतने खूबसूरत और जटिल इतिहास को आप तक अपने शब्दों में पहुंचा सकूं.

अपनी सीमित समझ के आधार पर मैं बाइरन की गलती नहीं दोहरा सकता. मैं चुप रहूंगा क्योंकि मुझमें दुनिया के इस छोटे से हिस्से के प्रति सम्मान है.

विदा लेते हुए मैंने कापे को बहुत धन्यवाद कहा.

कापे ने पापीते तक मुझे अपनी गाड़ी से छोड़ा जहां उतरते समय उसने पूछा, "मैं ये पूछना तो भूल ही गया कि टेपोटो द्वीप पर उन लोगों ने तुम्हें चार सिर वाला नारियल का पेड़ दिखाया या नहीं?"

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