आदिवासी जो जुटे है धरती को बचाने में

  • 14 मई 2019
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बड़े शहरों में रहने वाले लोग क़ुदरत से मिलने वाली चीज़ों का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं और यही वो लोग हैं जो प्रकृति के साथ खिलवाड़ करते हैं.

अगर क़ुदरत को बचाने का काम कोई करता है तो वो हैं इसके नज़दीक रहने वाले लोग. ख़ास तौर से पहाड़ों में रहने वाले लोग. वो प्रकृति को अपनी मां का दर्जा देते हैं तभी तो वो इसे संजोने की हर संभव कोशिश करते हैं.

शहरों से दूर प्रकृति की गोद में रहने वाले आदिवासियों की ज़िंदगी क़ुदरत की नेमतों पर निर्भर होती है. इसीलिए वो इसकी हिफ़ाज़त जी-जान से करते हैं.

लैटिन अमरीकी देश कोलंबिया के अरहुआको समुदाय के लोग, प्राचीन काल से अमरीकी महाद्वीप में रहते आए हैं. यूरोपीय उपनिवेशकों के आने के बाद ये समाज के हाशिए पर धकेल दिए गए. इन्हें जंगलों और पहाड़ियों के बीच पनाह लेनी पड़ी.

आज अरहुआको समुदाय के लोग कोलंबिया के जंगली इलाक़ों में गुज़र-बसर करते हैं. वो ख़ुद को प्रकृति का संरक्षक मानते हैं. ये लोग कोलंबिया की सिएरा नेवादा सैंटा मार्टा की पहाड़ियों के बीच रहते हैं.

अरहुआको समुदाय का संबंध कोगी, वीवा और मलायो समुदाय से है. बताया जाता है कि इन तीनों समुदायों के पूर्वजों का संबंध लैटिन अमरीका पर पहले राज करने वाली टाइरोना सभ्यता से है. कहा तो ये भी जाता है कि सोलहवीं सदी में स्पेन के उपनिवेशकों ने इन समुदायों को ख़त्म कर दिया था. जो बाक़ी बचे थे वो अपनी जान की हिफ़ाज़त के लिए सिएरा नेवादा सैंटा मार्टा की पहाड़ियों में चले गए थे.

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दुनिया की सबसे ऊंची माउंटेन रेंज

इन पहाड़ों को दुनिया की सबसे ऊंची माउंटेन रेंज कहा जाता है. ये इलाक़ा कोलंबिया के कैरेबियाई तट से ऊपर की तरफ़ बढ़ता चला जाता है. ये ऐसा इलाक़ा है, जिसका इकोसिस्टम बिल्कुल जुदा है. यहां बारिशों वाले जंगल भी हैं और बर्फ़ से ढंकी चोटियां भी. लगातार बारिश झेलने वाले समुद्री तट भी हैं, तो सूखे पहाड़ी इलाक़े भी.

यूनेस्को ने साल 1979 में इस पहाड़ी सिलसिले को बायोस्फेयर रिज़र्व ऑफ़ मैन एंड ह्यूमैनिटी का नाम दिया था. 2013 में साइंस पत्रिका ने इसे दुनिया का कभी ना बदलने वाला इको-सिस्टम माना है.

इस पहाड़ी इलाके में रहने वाले तीनों आदिवासी समुदायों के लोग ख़ुद को प्रकृति का बड़ा भाई बुलाते हैं. इन तीनों समुदायों की कुल आबादी 90 हज़ार है. मेमोस नाम के रूहानी पेशवा इन तीनों समुदायों की अगुवानी करते हैं. यहां के लोग प्रकृति की पूजा करते हैं और जो लोग मेमोस बनना चाहते हैं, उन्हें भरी जवानी में ही दुनियादारी वाला जीवन त्यागकर रूहानी तालीम हासिल करने के लिए ट्रेनिंग लेनी पड़ती है.

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मेमोस बनने के लिए बचपन से लेकर जवान होने तक ट्रेनिंग चलती है. ग्रह-नक्षत्रों से सीधे संपर्क साधना ट्रेनिंग का अहम हिस्सा है. इन्हें लगता है वो तमाम ग्रहों से बात करके हर मसले का हल निकाल सकते हैं. टाइरोना हेरिटेज ट्रस्ट के संस्थापक और डॉक्यूमेंट्री फ़िल्मकार अलान इराईरा का कहना है कि मेमोस बनने की ट्रेनिंग में हर जीव की ज़िंदगी में संतुलन के साथ रूहानी दाई का किरदार निभाने के तरीक़े सिखाए जाते हैं.

मानव वैज्ञानिक वेड डेविड ने लंबा अरसा अरहुआको समुदाय के बीच गुज़ारा है उनका कहना है कि जिस पहाड़ी इलाक़े में अरहुआको समुदाय के लोग रहते हैं वहां तक पहुंचना आसान नहीं है. लगभग पांच सदियों से ये लोग यहां ऐसे ही अलग-थलग रहकर ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं. बाहरी लोगों के अतिक्रमण से अपने इलाक़े की हिफ़ाज़त बखूबी करते हैं.

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पिछले कुछ दशकों से कोलंबिया हिंसा और बग़ावत की उठा-पटक का शिकार रहा है. तमाम समूहों के बीच गोलीबारी का असर अरहुआको पर भी पड़ा है. अरहुआको को गुमशुदा आदिवासी कहा जाता है. अपने एकाकीपन के बावजूद ये लोग इंसान के कल्याण के लिए क़ुदरत और ब्रम्हांड के बीच तालमेल बनाए रखने लिए अथक प्रयास करते हैं. इस काम को अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं.

तीन दशक पहले सिएरा नेवादा सैंटा मार्टा के ऊपरी हिस्सा की बर्फ पिघलने लगी तो यहां के स्थानीय लोगों को चिंता हुई. पानी के सोते, मैदान और जंगली इलाक़े सूखने से तितलियां ग़ायब होने लगीं. यहां के लोगों को चिंता होने लगी कि जलवायु परिवर्तन का असर अब इनके इलाक़े में भी नज़र आने लगा है. उन्होंने सरकारी स्तर पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए अपनी संस्था बनाई.

फ़िल्मकार इराईरा का कहना है कि यहां के लोगों को डर सताने लगा था कि अभी तक उन्होंने धरती को बाचने के जो भी प्रयास किए हैं वो सभी बेकार चले जाएंगे. मेमोस ने अपने लोगों को मनाया कि उन्हें अपनी कोशिशें दूसरों तक पहुंचानी होंगी लिहाज़ा उन्होंने इराईरा को फिल्म बनाने के लिए बुलाया. फ़िल्म का नाम था, फ्रॉम द हार्ट ऑफ़ दी वर्ल्ड द एल्डर ब्रदर्स वॉर्निंग. दो दशक बाद उन्होंने एक बार फिर इसी फ़िल्म का सीक्वल बनाने के लिए बुलाया.

सिएरा नेवादा सैंटा मार्टा के पहाड़ों में रहने वाले तीनों समुदायों का अलग- अलग हिस्सों में कब्ज़ा है. कोगी समुदाय का उत्तरी हिस्से में है. वीवा समुदाय का दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में कब्ज़ा है. जबकि, अरहुआको समुदाय के पास सिएरा नेवादा सैंटा मार्टा पहाड़ी सिलसिले का सबसे बड़ा हिस्सा है.

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1983 में इनके इलाक़े को कोलम्बिया सरकार से मान्यता भी मिल गई थी. यहां इस आदिम समुदाय के लोगों को स्वायत्तता हासिल है. इनके इलाक़े की राजधानी का नाम नबुसिमेक है. यहां बाहरी लोगों को आने की इजाज़त नहीं है. कुछ ख़ास लोग ही यहां आ सकते हैं. यहां तक कि राजधानी के दरवाज़े पर ही बोर्ड चस्पां है, जिस पर लिखा है 'बाहरी लोगों का यहां आना मना है'. यहां फ़ोटोग्राफ़ी की भी इजाज़त नहीं है.

बदलते वक़्त के साथ अब इन लोगों ने भी ख़ुद को बदल लिया है. अपने इलाक़े की बहुत सी जगहों पर अब बाहरी लोगों को आने की इजाज़त मिल गई है. इसका मक़सद टूरिज़्म को बढ़ाना भी है. और, अरहुआको समुदाय के लोगों का हुनर दूर तक पहुंचाना भी है. 1995 के बाद से इस समुदाय के लोगों ने आपसी मेल-जोल से कई सहकारी संस्थाएं बना ली हैं. ये लोग ऑर्गेनिक कॉफ़ी पैदा करके निर्यात करते हैं. जब कॉफ़ी का मौसम नहीं होता तो ये लोग कॉफ़ी का विकल्प कोकोआ बेचते हैं. यहां के रूहानी नेता और इज़क्वार्डो ने निर्यात बढ़ाने के मक़सद से स्थानीय स्तर पर ऑर्गेनिक ब्राउन शुगर की खेती को बढ़ावा दिया है. इसे लोकल ज़बान में इसे पनेला कहते

इज़क्वार्डो का कहना है कि वो खेती में किसी भी तरह के ख़तरनाक कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं करते, क्योंकि वो धरती मां को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते. साथ ही उनका मक़सद दुनिया को बताना है कि धरती मां को नुक़सान पहुंचाए बिना कैसे खेती की जा सकती है. वो इसके अलावा अपनी संस्कृति और कला को भी प्रमोट करना चाहते हैं. कैश इकॉनोमी का साथ मिलने से जहां इस समुदाय का कल्याण हुआ है. वहीं, इन्हें अपनी इलाके को संजोने में भी मदद मिली है.

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