दुनिया का सबसे पुराना शाकाहारी रेस्टोरेंट

  • 17 जून 2019
रेस्टोरेंट इमेज कॉपीरइट Haus Hiltl

खाना इंसान की बुनियादी ज़रूरत है. वक़्त के साथ उसमें बहुत से बदलाव होते रहे हैं. लोगों की जेब भारी होनी शुरू हुई तो पसंद के मुताबिक़ उन्होंने बाहर जाकर खाना शुरू किया.

बाज़ार में बहुत तरह के रेस्टोरेंट की बहार सी आ गई. कुछ रेस्टोरेंट ऐसे हैं जो इतिहास बन गए. ऐसे ही रेस्टोरेंट में से एक है स्विट्ज़रलैंड के ज़्यूरिख़ का हौस हिल्ट. जो पिछले सौ साल से आबाद है और इसने पूरे यूरोप के खाने के अंदाज़ को बदल दिया. ये ख़ालिस शाकाहारी रेस्टोरेंट है.

हौस हिल्ट ज़्यूरिख़ का सबसे मशहूर और खाने के शौक़ीनों का पसंदीदा रेस्टोरेंट है. गिनेस बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में इसे दुनिया का सबसे पुराना शाकाहारी रेस्टोरेंट होने का ख़िताब हासिल है. इसकी शुरुआत ज़्यूरिख़ के हिल्ट परिवार ने 1898 में की थी.

तब से अब तक इस परिवार की ना जाने कितनी पीढ़ियां अपने पुरखों की विरासत संभालते हुए कामयाबी से आगे बढ़ रही हैं.

शुरुआती दौर में यहां सिर्फ़ ज़्यूरिख़ के स्थानीय पकवान ही मिला करते थे. इनमें आलू और जड़ वाली सब्ज़ियां शामिल होती थीं.

लेकिन जैसे-जैसे नई पीढ़ियों ने इसकी बागडोर संभाली, इस रेस्टोरेंट ने सरहदों की दीवारें तोड़ दीं. आज यहां हिंदुस्तानी, एशियन, मेडिटेरेनियन और स्विट्ज़रलैंड के तमाम शाकाहारी पकवान मिलते हैं.

इमेज कॉपीरइट Haus Hiltl

हौस हिल्ट दो मंज़िला इमारत वाला रेस्टोरेंट है. इसकी पहली मंज़िल पर ए-ला-कार्ट रेस्टोरेंट है. यहां खाने के इंतज़ाम के साथ-साथ कुकिग की ढेरों किताबें भी मौजूद हैं. पिछले एक दशक में हिल्ट रेस्टोरेंट ने पूरे ज़्यूरिख़ में अपनी क़रीब आठ फ्रैंचाइजी खोल ली हैं.

ज़्यूरिख़ के लोग मुख्य रूप से मांस खाने के शौक़ीन हैं. ऐसे में एक शाकाहारी रेस्टोरेंट का इतने बड़े पैमाने पर सिक्का जमाना अपने आप में बड़ी बात है.

द कलिनरी हेरिटेज ऑफ़ स्विट्ज़रलैंड के लेखक और पेशे से पत्रकार पॉल इम्हॉफ़ का कहना है कि जब उन्नीसवीं सदी में ये रेस्टोरेंट क़ायम हुआ तो यहां के पैसे वाले वर्ग के बीच सब्ज़ियों के शौक़ीनों को निचले स्तर का माना जाता था. उन्हें घास-फूस खाने वाला कहकर चिढ़ाया जाता था.

पूरे यूरोप में मुख्य रूप से सुअर और बछड़े का गोश्त ही खाया जाता था. इसका ताल्लुक़ आर्थिक और सामाजिक स्तर से भी जुड़ा था. सब्ज़ियों के नाम पर पनीर, आलू और जड़ वाली सब्ज़ियां ही खाई जाती थीं.

हिल्ट रेस्टोरेंट के क़ायम होने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है. बताया जाता है कि एम्ब्रोसुइस हिल्ट नाम के दर्ज़ी को गठिया का मर्ज़ था.

डॉक्टरों ने कहा कि अगर उसे ज़्यादा दिनों तक जीना है तो गोश्त खाना छोड़ना होगा.

ये बात 1890 की है. उन दिनों ज़्यूरिख में बिना गोश्त का खाना शायद ही कहीं मिलता था. एब्सटिनेन्स नाम का सिर्फ़ एक ही रेस्टोरेंट था, जहां सब्ज़ियों के कुछ पकवान मिला करते थे.

इमेज कॉपीरइट Haus Hiltl

यहां खाना खाने के बाद एम्ब्रोसुइस हिल्ट की शाकाहारी भोजन में दिलचस्पी बढ़ने लगी. ये रेस्टोरेंट बहुत ही ख़स्ताहाल था.

एम्ब्रोसुइस हिल्ट ने 1904 में इसे ख़रीद लिया और इस रेस्टोरेंट की कुक मार्था से शादी कर ली. और फिर रेस्टोरेंट का नाम बदलकर हौस हिल्ट कर दिया.

जिस साल एम्ब्रोसुइस हिल्ट ने ये रेस्टोरेंट ख़रीदा उसी साल स्विट्ज़रलैंड में प्रकृति के नज़दीक आने, पौष्टिक और संतुलित भोजन खाने की मुहिम छिड़ गई. डॉक्टर मैक्सीमिलियन बिरशर बेनर ने मीट-फ्री खाने के लिए मुहिम छेड़ दी.

इसके बाद लोगों का रुझान पौष्टिक खाने की ओर झुकने लगा और हिल्ट रेस्टोरेंट में लोगों की भीड़ जुटनी शुरु हो गई.

हालांकि शुरूआती दौर में इस रेस्टोरेंट को चलाने में काफ़ी दिक़्कत हुई थी. फिर हालात बदलने लगे. 1951 में रेस्टोरेंट का मौजूदा रूप सामने आया.

इमेज कॉपीरइट Haus Hiltl

असल में 1951 में ही एमब्रोसुइस की बहू वर्ल्ड वेजिटेरियन कांग्रेस के लिए स्विट्ज़रलैंड के सरकारी प्रतिनिधि के तौर पर दिल्ली आई थीं.

यहां उन्हें हिंदुस्तानी खानों का ज़ायक़ा इतना अच्छा लगा कि उन्होंने वापस अपने देश जाकर ख़ुद के रात के खाने के लिए भारतीय पकवान बनवाने शुरू कर दिए.

वो दिल्ली से धनिया, हल्दी, ज़ीरा, इलाइची बड़ी मात्रा में साथ ले गई थीं. यही नहीं, वो यहां से बहुत से पकवान बनाने का तरीक़ा भी सीख कर गईं और अपने रेस्टोरेंट के रसोइयों को भी उन्हें बनाना सिखा दिया. और देखते ही देखते इनके रेस्टोरेंट में भारतीयों की भीड़ जुटने लगी.

यहां तक कि जब भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई स्विट्ज़रलैंड गए, तो उन्होंने भी यहां भारतीय खानों का लुत्फ़ लिया. और जब स्विस एयरलाइंस ने हौस हिल्ट की मदद से अपने यात्रियों को शाकाहारी भोजन परोसना शुरू किया तो इससे ये रेस्टोरेंट दुनिया भर में मशहूर हो गया.

इमेज कॉपीरइट Haus Hiltl

जिस वक़्त हौस हिल्ट क़ायम हुआ था उसके आस-पास बहुत-सा जंगली इलाक़ा था.

लेकिन जैसे-जैसे आबादी बढ़ती गई, विकास होता गया, हौस हिल्ट का और विस्तार हो गया. 1960 का दशक आने तक लोगों के खाने के तरीक़े और ज़ायक़े में बहुत बदलाव आ चुका था. शाकाहारी खानों में लोग तरह-तरह के तजुर्बे करने लगे थे.

ऐसे में नौजवान पीढ़ी को आकर्षित करना और उसे बनाए रखना चुनौती था. लिहाज़ा 1973 में हाइंज़ हिल्ट ने रेस्टोरेंट में एक नया कॉन्सेप्ट लॉन्च किया. इसका नाम था हिल्ट वैजी.

जिसके तहत रेस्टोरेंट में कई तरह के सलाद बार, टेक-अवे काउंटर और जूस काउंटर खोले गए. ज्यूरिख़ के लिए ये एक नया बदलाव था.

हौस हिल्ट की ख़ासियत यही है कि यहां नए-नए तजुर्बे होते रहते हैं.

रॉल्फ़ का कहना है कि सबसे दिलचस्प बात ये है कि रेस्टोरेंट में जितने भी लोग आते हैं वो शाकाहारी और मांसाहारी दोनों होते हैं लेकिन इस रेस्टोरेंट में उन्हें सब्ज़ियों में ही वो ज़ायक़ा मिल जाता है जो मांसाहारी पकवानों में होता है.

इमेज कॉपीरइट Haus Hiltl

2015 में हौस हिल्ट के ही पांचवीं मंज़िल पर द हिल्ट अकादेमी खोली गई. यहां शाकाहारी खाने के शौक़ीन और प्रोफ़ेशनल शेफ़ शाकाहारी डिश बनाना सीखते हैं.

यहां एक कोर्स मार्गरिटा की इंडियन रेसिपी पर आधारित है. रॉल्फ़ ने खुद भी बहुत-सी कुकिंग बुक्स लिखी हैं.

अब न्यूयॉर्क और लॉस एंजेलेस जैसी जगहों पर भी फ़्लैगशिप रेस्टोरेंट खोलने की तैयारी है.

(बीबीसी ट्रैवल पर मूल अंग्रेज़ी लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार