इस शहर के लोग बेफ़िक्र जीते हैं

  • 24 जुलाई 2019
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पणजी के एक बाज़ार में दोपहर के वक़्त पैदल चलते हुए मैंने देखा कि गली की सारी दुकानें बंद हैं.

मैं नये जूते की तलाश में थी, क्योंकि पुराने जूते पैदल चलते-चलते घिस गए थे और आज उन्होंने जवाब दे दिया था.

मैंने अपने एक दोस्त को फ़ोन करके दुकानें खुलने का समय पूछा तो उसने बताया कि मुझे शाम तक इंतज़ार करना पड़ेगा.

गोवा में दोपहर 1 बजे से लेकर शाम के 5 बजे तक कुछ भी नहीं खुला रहता.

समुद्र किनारे बसा भारत का यह पश्चिमी प्रांत दोपहर के भोजन के बाद आराम फ़रमाता है और बाहर की गर्मी की चिंता नहीं करता.

'सुशेगाद'- यह शब्द पुर्तगाली शब्द 'सोशेगाडो' से बना है जिसका अर्थ होता है शांत.

इस शब्द का इस्तेमाल गोवा के लोगों के ढुलमुल रवैये के संदर्भ में किया जाता है, जो बारहों महीने संतुष्ट होकर जीते हैं.

फ़िक्र क्यों करें

बेंगलुरु में रहने वाले पेरी गोज कहते हैं, "सुशेगाद इस जन्मजात अहसास से जुड़ा कि ज़िंदगी की छोटी-छोटी चीज़ों के लिए आप लड़ नहीं सकते और ऐसा करना भी नहीं चाहिए."

"गर्म और उमस भरी दोपहर में सबसे अच्छा यह है कि आप काम बंद करें और आराम से समय बिताएं, वरना आप ख़ूबसूरत शाम का आनंद नहीं ले पाएंगे."

मगर सुशेगाद दोपहर की झपकी से कुछ अधिक है.

गोवा में पैदा हुए और अपने वयस्क जीवन का अधिकांश हिस्सा यहीं बिताने वाले मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव शेखर वैद्य कहते हैं, "यह ज़िंदगी को आराम से जीने के बारे में है. आखिर जल्दबाज़ी किस बात की है?"

पत्रकार जोआना लोबो उत्तरी गोवा में पली-बढ़ी और अब मुंबई में रहती हैं. सुशेगाद उनके बचपन से जुड़ी यादों में शामिल है.

"रविवार को परिवार के साथ मछली और चावल खाकर आराम करते हैं, गांव के बारे में गपशप करते हैं और कार्ड खेलते हैं. यह आराम करने का, जीवन से संतुष्ट रहने का, प्यार किए जाने का अहसास है."

मैंने गोवा के जितने भी लोगों से बात की- जो गोवा में रहते हैं या गोवा से चले गए हैं- उनकी बातों में संतोष, शारीरिक आराम और मानसिक शांति का ज़िक्र बार-बार आता है.

शांति की ज़िंदगी

भारत के दूसरे शहरों में जहां गाड़ियों की आवाजाही और उनकी पों-पों का शोर गूंजता रहता है, वहीं गोवा के शहरों और गांवों में चर्च की घंटियों और साइकिल की घंटियों की मधुर झनकार सुनाई देती है.

सुशेगाद का मतलब आलस्य या काम में मन न लगना नहीं है. लोबो इसे तुरंत स्पष्ट कर देती हैं.

"गोवा से बाहर मुंबई में रहते हुए मेरी सबसे बड़ी शिकायत यही है कि इस शब्द को गलत समझा गया और यह मतलब निकाल लिया गया कि गोवा के लोग आलसी और ढुलमुल होते हैं. यह सच नहीं है. हम कड़ी मेहनत करते हैं लेकिन हम ज़िंदगी का लुत्फ़ भी उठाना चाहते हैं."

पेरी गोज भी कुछ ऐसा ही कहते हैं. वह एक पारिवारिक स्थिति का ज़िक्र करते हैं जिसमें वह असहाय महसूस करते हैं.

"कभी-कभी मेरी आत्मा के लिए मुझे यही सबसे अच्छा लगता है कि ठंडी बीयर पिएं और एक अच्छी झपकी ले लें."

"यह सुस्ती या आलस्य नहीं है. यह तय करना है कि किस चीज़ के लिए लड़ना है और किसे छोड़ देना है. यह दोनों के बीच निर्णय लेने की समझ है."

पुर्तगाली प्रभाव

भारत के विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों के बारे में धारणाएं बनी हुई हैं. पंजाबी रौबीले और दमदार आवाज़ वाले समझे जाते हैं तो बंगाली दिमाग़ वाले और भीड़ में उग्र होने वाले माने जाते हैं.

गोवा के लोगों को अपनी ही ताल पर थिरकने वाला समझा जाता है. सिर्फ़ 15 लाख आबादी वाला यह राज्य भारतीय हिंदू और पुर्तगाली कैथोलिक प्रभावों के बीच मौज में रहता है.

पुर्तगाली सबसे पहले 1510 ईस्वी में गोवा पहुंचे थे. उनके आने के कई कारण थे, जिनमें प्रमुख था काली मिर्च, हरी इलायची और दूसरे मसालों का व्यापार और ईसाई धर्म का प्रचार.

गोवा के ख़ूबसूरत समुद्र तटों, हरियाली से भरे जंगलों और समुद्री व्यापार को आसान बनाने वाले बंदरगाह को देखकर वे ख़ुश हो गए और यहीं रह गए- 450 साल से अधिक समय तक.

अंग्रेज़ों से भारत की आज़ादी के 14 साल बाद 1961 तक गोवा पुर्तगाल का उपनिवेश बना रहा.

गोवा के स्थानीय लोग भारत के बारे ऐसे बातें करते हैं, मानो वह उनसे अलग हो और दोनों में बहुत कम समानताएं हों. सुशेगाद पुर्तगाल के जमाने से चले आ रहे मिज़ाज का अवशेष है.

पिछली पीढ़ी के कई गोवा निवासियों के पास पुर्तगाल का पासपोर्ट है और वहां उनके घर भी हैं. गोवा में अब भी पुर्तगाली भाषा बड़े पैमाने पर समझी और बोली जाती है.

सुशेगाद, कैथोलिक धर्म, खानपान, संगीत और नृत्य, कला और शिल्प अब भी पुर्तगाली राज के अवशेष हैं.

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भारत से अलग

गोवा के व्यंजनों में पुर्तगाली व्यंजनों और भारतीय तटीय सामग्रियों, जैसे नारियल और काली मिर्च का मिलन दिखता है. यहां हर जगह मिलने वाला ब्रेड पाव भी पुर्तगाली आयात है.

अगर आप पणजी के लैटिन क्वार्टर कहलाने वाले फॉन्टैन्हास इलाक़े में घूमें तो आपको चर्च से लेकर हवेलियों तक में पुर्तगाली वास्तुकला दिखेगी.

कुछ लोगों ने पुरानी पुर्तगाली हवेलियों के शिल्प को बरक़रार रखते हुए उनकी मरम्मत शुरू कराई है. क्वेपेम में पलेसियो डो डियो और लॉटोलिम में फ़िगुरेडो हाउस को सैलानियों के लिए खोल दिया गया है.

वैद्य का कहना है कि गोवा और पुर्तगाल का आपसी प्रेम आज भी बरक़रार है.

"अंग्रेज़ों ने भारतीय संसाधनों का शोषण किया था, लेकिन पुर्तगालियों ने गोवा को सिर्फ़ पैसे बनाने का उपनिवेश नहीं समझा था."

"इसे पुर्तगाल का एक हिस्सा समझा गया था. इसलिए गोवा के लोगों ने भी उनको अपना समझा, बाहरी नहीं."

क्या सुशेगाद सिर्फ़ गोवा के कैथोलिक ईसाइयों के लिए प्रासंगिक है? यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि पुर्तगाली विरासत उन्हीं के बीच सबसे मज़बूत है, जिनको पुर्तगाली जेसुइट पुजारियों ने धर्म परिवर्तन कराया था.

गोवा की सिर्फ़ 25% आबादी कैथोलिक है, जबकि 66% आबादी हिंदुओं की है.

इस बारे में मैंने जिससे भी बात की, सबने यही कहा कि ऐसा नहीं है. जो भी कुछ साल के लिए गोवा में रह गया, उसने सुशेगाद को अपना लिया.

ब्लॉगर अनुराधा गोयल दिल्ली और बेंगलुरु में काम करने के बाद पांच साल पहले गोवा चली गई थीं.

उनका कहना है कि गोवा में सुशेगाद का वैसा ही आकर्षण है जैसा सूरज और समुद्र का.

वह कहती हैं कि पिछले 5 साल से जबसे वह गोवा में रह रही हैं, उनकी अपनी दिनचर्या धीमी हो गई है.

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कृषिप्रधान समाज

सुशेगाद की जड़ तक जाने के लिए गोवा के कृषि प्रधान समाज की विशेषताओं तक जाना पड़ता है.

गोवा के लोग खेतों में काम करने या मछली पकड़ने के लिए सुबह जल्दी उठ जाते थे. फिर वह सुबह के बाज़ार जाकर अपनी मछलियां बेचते थे.

काम करते हुए उन्होंने ज़रूरत के मुताबिक़ आराम करना सीख लिया. इस संतुलन से उन्हें संतुष्टि मिलती है.

दोपहर की झपकी से लेकर सुशेगाद तक का विकास गोवा के जीवन के तरीक़े का क़ुदरती विकास है.

पेरी गोज का कहना है कि क़ुदरत ने गोवा को समृद्धि के साथ बहुत कुछ दिया है. यह लोगों के संतोषी स्वभाव में झलकता है.

"गोवा में समुदाय का बंधन अब भी बहुत मज़बूत है- लोग एक साथ खेती और कटाई करते हैं, छत पर खप्पर डालते समय या घर की दीवारें रंगते समय सामूहिक श्रम करते हैं."

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बराबरी वाला समाज

गांव और शहर की सीमा का बस सांकेतिक महत्व है. यहां का समाज समतावादी है और पड़ोसियों से लोगों के अच्छे रिश्ते हैं.

यह सामाजिक व्यवहार पुराने दिनों से चला आ रहा है, जब गोवा सामाजिक रूप से अलग-थलग महसूस करता था.

भारत का बाक़ी हिस्सा अंग्रेज़ों से शासित था, लेकिन गोवा के लोगों पर पुर्तगालियों का शासन था.

इसलिए यहां एक दूसरे के साथ रहने की ज़रूरत थी, भले ही लोगों की सामाजिक स्थिति या धार्मिक विश्वास चाहे जो हो.

अनुराधा गोयल कहती हैं, "यदि आप गोवा में नये हैं तो सुशेगाद की आदत लगने में थोड़ा वक़्त लगता है."

"लेकिन जैसे-जैसे आप इसकी लय को पकड़ लेते हैं, आप इसका आनंद लेने लगते हैं और यह आपके दिन की रफ़्तार तय कर देता है."

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