खाने की याद बरसों तक कैसे बनी रहती है?

  • 12 सितंबर 2019
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मैं तब सिर्फ़ तीन साल की थी जब 1980 में मेरे माता-पिता, मेरी बहन और मैं सोवियत संघ के लेनिनग्राद से अमरीका चले गए.

हमें गद्दार कहा गया. हमारी सोवियत नागरिकता छीन ली गई, क्योंकि हमने "बुरे पश्चिमी पूंजीवाद" के लिए साम्यवाद की ओर से मुंह फेर लिया था.

मेरे परिवार के पलायन के पीछे मैं ही उत्प्रेरक थी. मेरी बहन को गुर्दे की बीमारी थी. डॉक्टरों को लगता था कि चूंकि वह मरने वाली है, इसीलिए मैं उसकी जगह लेने के लिए पैदा हुई हूं.

ज़्यादातर सोवियत परिवारों में सिर्फ़ एक ही बच्चे थे, क्योंकि बच्चों का ख़र्च उठाना बहुत कठिन हो गया था.

किस्मत से मेरी बहन बच गई, लेकिन सोवियत संघ में यहूदी विरोधी माहौल के कारण मेरे पिता को जो नौकरी मिली थी, उसमें उनको बहुत दौड़-धूप करनी पड़ती थी और मां अकेले 2 बच्चों को नहीं संभाल सकती थी.

मेरे माता-पिता नहीं चाहते थे कि हम और कष्ट में रहें. जब उन्होंने पलायन का फ़ैसला किया तब उन्होंने सोचा था कि अब कभी वापस नहीं लौटना.

रात में आने वाले फोन कॉल्स

हम कैलिफोर्निया में बस गए. पूर्व सोवियत संघ के बारे में हमने कहानियों, ख़तों और रात में आने वाले फोन कॉल्स के जरिये जाना.

लेनिनग्राद में रहने वाले हमारे रिश्तेदार साल में दो बार पैकेट भेजते थे. उनमें हमारे परिवार की ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें, सरकारी कंपनी मेलोडिया के रिकॉर्ड्स, बच्चों की किताबें, गुड़िया, चॉकलेट और लकड़ी के खिलौने होते थे.

चॉकलेट और लकड़ी के खिलौनों की गंध पार्सल के बाहर तक आती थी.

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मां हमें बर्थ-डे कार्ड्स और चिट्ठियां पढ़कर सुनाती थी, क्योंकि हम टेढ़ी-मेढ़ी लिखावट को नहीं पढ़ पाते थे.

शीत-युद्ध के दौरान दूरियों को पाटने की जगह हमारे रूसी रिश्तेदारों के फोन कॉल्स बड़ी अड़चन थी.

कई सोवियत परिवारों के घर में फोन नहीं थे और लोगों को लगता था कि सोवियत ख़ुफ़िया एजेंसी केजीबी उनके फोन टैप करती थी.

पांच मिनट के फोन कॉल के लिए हमारे रिश्तेदारों को एक घंटे का सफ़र तय करके लेनिनग्राद के सेंट्रल पोस्ट ऑफिस आना पड़ता था.

लेनिनग्राद और कैलिफोर्निया के समय में 10 घंटे का अंतर था, इसलिए वहां से आने वाले फोन आधी रात में आते थे.

एक-दूसरे की बातें सुनने के लिए जोर से बोलना पड़ता था. शारीरिक और भावनात्मक दोनों रूप से रूस हमें बहुत दूर लगता था.

रूस की यात्रा

पलायन के बाद मैं पहली बार रूस तब गई जब मैं 18 साल की थी. लेनिनग्राद का नाम सेंट पीटर्सबर्ग हो गया था. सोवियत संघ ख़त्म हो चुका था और रूस अब संप्रभु देश था.

मैं अपनी मामी और चाची के पास रूकी, जिनको मैंने 15 साल से देखा नहीं था. हमने सिर्फ़ एक-दूसरे की तस्वीरें देखी थी, ख़त पढ़े थे और फोन पर बात की थी.

हालांकि मैं उनसे रूसी भाषा में बात कर सकती थी, लेकिन दिन भर ऐसा करना मुझे असहज लगता था.

मैं सेंट पीटर्सबर्ग जून में पहुंची थी. "सिटी ऑफ़ व्हाइट नाइट्स" सुदूर उत्तर में बसा महानगर है.

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Image caption सेंट पीटर्सबर्ग

यहां आधी रात में सूरज और चांद एक साथ आसमान में दिखते हैं. यह मुझे भावनात्मक रूप से रूस से और दूर कर देता था. मैं सो नहीं पाती थी.

सेंट पीटर्सबर्ग शहर से दूर मैं मां के साथ उनकी सहेली के बगीचे वाले घर में गई तो अप्रत्याशित रूप से मेरी बचपन की यादें ताज़ा हो गईं.

बचपन का वह स्वाद

मां और उनकी सहेली जब बातें कर रही थीं तब मैं बगीचे में लगी बेरी में खोयी थी.

मुझे पता नहीं था कि वे खाने लायक हैं या नहीं, लेकिन मैंने कुछ छोटे जंगली स्ट्रॉबेरी तोड़े और उनको चख लिया. उसका मीठा रस मेरी चीभ से होता हुए गले तक पहुंच गया.

मुझे उसका स्वाद कैसे पता था? मैंने मन में सोचा. ये स्ट्रॉबेरी कैलिफोर्निया जैसे नहीं हैं.

मैंने बगीचे की स्ट्रॉबेरी और लाल व काले रंग के करंट खाए और उनके गोल बीजों को जीभ से चाट गई. मैं उनके स्वाद और उनकी बनावट को जानती थी. लेकिन कैसे?

बेरी खाने से लाल हुए होंठ के साथ मैं मां के पास पहुंची और उनसे उन बेरीज़ और करंट के बारे में पूछा.

मेरी मां मुस्कुराई और कहा कि बचपन में मैं ज़ेम्लैनिका (जंगली स्ट्रॉबेरी), स्मारोडिना (करंट), क्रूज़ोव्निक (रसभरी) और चेर्निका (जंगली ब्लू बेरी) ख़ूब खाती थी, ख़ासकर तब हम परिवार के साथ गर्मी की छुट्टियां मनाने लिथुआनिया के पाब्रेडे जाते थे.

दो महीने बाद मैं कैलिफोर्निया लौट आई, लेकिन उन बेरीज़ का स्वाद मुझे याद रह गया. मेरे लिए यह सवाल अनसुलझा रह गया कि खाने की याद इतने लंबे समय तक कैसे रहती है.

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अवचेतन में बसी याद

मैसेचुएट्स यूनिवर्सिटी से रिटायर मनोविज्ञान की प्रोफेसर सुसान क्रॉस व्हिटबॉर्न के मुताबिक मेरे दिमाग को पता था कि मुझे ये बेरीज़ अच्छी लगती हैं, भले ही उनको खाने की कोई याद नहीं थी.

वह कहती हैं, "खाने की याद मस्तिष्क के बुनियादी, अशाब्दिक हिस्से से जुड़े हैं जो चेतन मस्तिष्क से आगे जाते हैं, इसीलिए जब आप ऐसा कुछ खाते हैं जो आपकी अवचेतन यादों को जगा दे तो उसकी गहरी भावनात्मक प्रतिक्रिया होती है."

"आप उन यादों को लफ़्जों में बयां नहीं कर सकते, लेकिन आपको पता है कि उसमें ऐसा कुछ है जो आपके अतीत से बहुत गहरे जुड़ा है. वह याद किसी जगह या व्यक्ति की भी हो सकती है."

कैलिफोर्निया में बचपन में मुझे स्ट्रॉबेरी क्यों पसंद थे, इसकी वजह लिथुआनिया के ज़ेम्लैनिका थे, जिसकी याद भी मुझे नहीं थी.

मां को ज़ेम्लैनिका के साथ मेरा रिश्ता पता था, इसीलिए हर बर्थ-डे पर वह मेरे बिस्तर के बगल में ताज़े स्ट्रॉबेरी रख देती थी.

मैं 20 बरस की हुई तो उन्होंने मुझे बोस्निया में स्ट्रॉबेरी और रस्पबेरी के पौधे लगाने के लिए प्रेरित किया.

परिवार के अतीत की तलाश

मैं फिर से उन बेरीज़ को चखना चाहती थी जहां मैंने पहली बार उनको ढूंढ़ा था. इसलिए दस साल बाद 2005 में मैं फिर पूर्व सोवियत संघ गई.

मैं पूर्वी लिथुआनिया के पाब्रेडे गई, जिसके दो मकसद थे- अपनी पसंदीदा बेरी को ढूंढ़ना और और उस शख्स की तलाश करना जिसने सोवियत संघ से पलायन में मेरे परिवार और कई अन्य परिवारों की मदद की थी.

साशा शैपिरो पाब्रेडे में नाई थे. करीब 20 साल तक वह सोवियत यहूदियों की पलायन में मदद करते रहे.

वह उनके रिश्तेदारों को गोपनीय ख़त भेजते थे जिससे कोई उनके आप्रवासन का ख़र्च उठाने को तैयार हो जाए.

केजीबी अगर किसी सोवियत नागरिक को पश्चिमी देशों के साथ संवाद करते हुए पकड़ती थी तो उनको गिरफ्तार किया जा सकता था और अक्सर साइबेरिया जैसे मुश्किल इलाकों में भेजा दिया जाता था.

लिथुआनिया में लेनिनग्राद की तुलना में केजीबी की सेंशरशिप कम थी और शापिरो एक छोटे शहर के नाई थे इसलिए उन्हें इस बात का ख़ौफ़ नहीं था कि केजीबी उन पर नज़र रख सकती है.

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Image caption बीस साल से मिशा शापिरो के पिता सोवियत यहूतियों को यूएसएसआर से निकल भागने में मदद की.

दूर के चाचा की खोज

मेरी मां को पता था कि उनके एक चाचा 1920 के दशक में ही सेंट लुइस, मिसौरी में बस गए थे.

स्टालिन ने 1937 में पश्चिमी देशों के साथ संचार को प्रतिबंधित कर दिया था इसलिए मेरी मां के परिवार का उनसे संपर्क टूट गया था और उनके पास उनका पता भी नहीं था.

1970 के दशक के आख़िर में मेरी मां ने शापिरो से गुजारिश की कि क्या वे अपने पते से सेंट लुइस शहर के सिटी हॉल को ख़त भेजकर उनके चाचा का पता लगाने में मदद कर सकते हैं, ताकि वे अमरीका में उनके आप्रवासन का ख़र्च उठा लें.

शापिरो राजी हो गए. अगर उन्होंने साहस नहीं किया होता तो हम कभी अमरीका नहीं पहुंच पाते.

सेंट लुइस सिटी हॉल में आने वाली चिट्ठियों को देखने वाला क्लर्क टिकटों का जमा करने का शौकीन था. लिफाफे पर सोवियत संघ के स्टांप को देखकर उसने वह ख़त मेयर के दफ़्तर में एक सहायक को दे दिया.

गोपनीय मददगार

मैं पाब्रेडे पहुंची तो मुझे साशा का सरनेम नहीं पता था. उनको या उनके परिवार को कैसे ढूंढ़ा जाए, यह भी नहीं मालूम था.

बेलारूस की सीमा से 14 किलोमीटर अंदर ज़ेइमेना नदी के किनारे पाब्रेडे एक शांत शहर था जहां पोलिश मूल के लोगों की आबादी लिथुआनिया और रूस के लोगों से ज़्यादा थी.

मैंने बस स्टैंड पर एक महिला से ब्रूश्निका (लोगानबेरी) का एक थैला खरीदा और उनसे पूछा कि क्या वह साशा नाम के किसी नाई को जानती हैं.

उन्होंने मुझे बताया कि साशा का असली नाम ज़िस्को शापिरो था और उनका निधन हो चुका है, लेकिन मैं उनके बेटे मोइसेज (मिशा) शापिरो से मिल सकती हूं.

मीशा उसी दुकान में नाई का काम करते थे, जिसमें उनके पिता काम किया करते थे.

जब मैं मिशा तक पहुंची तब तक उस छोटे से शहर में कई लोगों ने उनको बता दिया था कि एक विदेशी लड़की हाथ में लाल बेरी का थैला लेकर उनको तलाश रही है.

मिशा हैरान थे कि मैं उनके परिवार से मिलने और बेरी ढूंढ़ने वहां तक आई हूं.

मिशा के घर में उनकी पत्नी ने मेरे लिए खाना बनाया. मैंने उनकी बेटी और नातिन को बताया कि वे किस तरह अपने कंप्यूटर के ट्रांसलेशन सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करके उन परिवारों के साथ संवाद कर सकते हैं, जिनकी साशा ने मदद की थी और जो अब दुनिया भर में फैले हुए हैं.

उनमें से कुछ परिवारों ने शापिरो को ख़त लिखकर अपने परिवार के इतिहास के बारे में जानकारी मांगी थी.

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पुराने घर की यात्रा

बेरीज़ और बगीचे वाले अपने घर को तलाशे बगैर पाब्रेडे आने का मेरा मकसद पूरा नहीं होता था.

मुझे अपने घर की याद नहीं थी और उसकी कोई तस्वीर भी नहीं थी. मैं इतना जानती थी कि मेरे माता-पिता ने पेन रेगिना नाम की एक पोलिश महिला से एक मंजिला घर का एक कमरा किराये पर लिया था.

हर साल गर्मियों की छुट्टियों में हम लेनिनग्राद से 700 किलोमीटर दक्षिण में यहां तक आते थे. हम जंगलों में घूमते थे, खेलते थे और वे चीज़ें भी खाते जो लेनिनग्राद में नहीं मिलती थी.

मेरी चाची ने मुझे एक नक्शा बनाकर दिया था जिसमें गलियों के नाम लिखे थे. लेकिन सोवियत संघ टूटने के बाद गलियों के नाम बदल दिए गए थे.

मैंने कई लोगों से उस गली के बारे में पूछा जहां पेन रेगिना का घर था. आख़िरकार किसी व्यक्ति ने मुझे बताया कि उनकी मौत हो चुकी है, लेकिन जंगल के उस तरफ 48 नंबर के घर में उनके बेटे रहते हैं.

मैंने तिकोने छत और बड़े बगीचे वाले उस एक मंजिला घर तक पहुंच गई, जहां रेगिना के बेटा एलिक रहते थे.

एलिक के निमंत्रण पर मैं उनके बगीचे में एक घंटे तक करंट और जंगली ब्लू बेरी तोड़ती रही. पास के जंगल से मैंने रसभरी और ब्लू बेरी ढूंढ़े.

मुझे लगा कि मैं फिर से बचपन में पहुंच गई हूं. इस जगह परिवार के साथ छुट्टियां बिताने की पुरानी तस्वीरें ताज़ा हो गईं.

पाब्रेडे में बिताए दिनों को याद रखने के लिहाज से मेरी उम्र बहुत कम थी, लेकिन मैं सोचने लगी कि यहां चचेरे भाई-बहनों के साथ बेरी खाना, रूसी गीत गाना और पिघले हुए मक्खन के साथ उबले आलू खाना कैसा लगता होगा.

मुश्किल दिनों की याद

मैंने कल्पना की कि मेरी मां ने किस तरह साशा से संपर्क करके गोपनीय मदद मांगी होगी.

एक्जिट वीजा का आवेदन देने के बाद लेनिनग्राद में मेरे पिता को एक कार ने टक्कर मारी थी. मैं यह सोचकर सिहर गई कि पाब्रेडे में जब यह ख़बर मेरी मां तक पहुंची होगी तो उन्हें कैसा लगा होगा.

वह ठीक हो गए थे, लेकिन उनको अब भी लगता है कि केजीबी ने सोवियत संघ छोड़ने का आवेदन देने के लिए उनको सज़ा दी थी.

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व्हिटबॉर्न ने मुझसे कहा था, "खाने की यादों में सब कुछ शामिल रहता है. जिस जगह और जिन स्थितियों में खाना खाया गया वह भी."

"खाना पकाने के दौरान की गतिविधियां भी इन यादों से जुड़ी रहती है. परिवार का कोई करीबी सदस्य बचपन में आपको चॉकलेट कप केक बनाना सिखाए तो उस व्यक्ति के साथ यह अनुभव यादों में बस जाता है."

"परिवार के खाने के स्वाद और उसकी ख़ूशबू की याद अतिरिक्त भावनात्मक अर्थ रखती है."

प्राउस्टियन मोमेंट

फ्रांसीसी लेखक मार्सेल प्राउस्ट ने अपने उपन्यास "इन सर्च ऑफ़ लॉस्ट टाइम" में लिखा है कि कैसे वयस्क होने पर मैडेलीन केक खाते समय उनको अपनी चाची की याद आती थी जिनको उन्होंने अपने बचपन में चाय में केक मैडेलीन डुबोकर खाते देखा था.

अतीत की कोई याद आने के पल को "प्राउस्टियन मोमेंट" कहा जाता है. मेरे लिए जंगली बेरी को चखना सिर्फ़ प्राउस्टियन मोमेंट नहीं था, बल्कि अपने परिवार के अतीत को फिर से जोड़ने का पूरा अध्याय था.

जंगली बेरी सोवियत संघ में बिताए मेरे बचपन की निजी यादों से जुड़े हैं. मैं उन पलों को याद करके रोमांचित हो जाती हूं जब मैंने उनको खाया था.

मैं कई बार पूर्वी यूरोप आई और मैंने हमेशा कोशिश की कि मैं बेरीज़ को अपने साथ कैलिफोर्निया लेकर आऊं- जिसे देखकर अमरीकी कस्टम अधिकारी नाख़ुश होते हैं.

घर पर मैं अब भी उम्मीद करती हूं कि बर्थ-डे पर मुझे मां से ताज़े स्ट्रॉबेरी मिलेगी.

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी ट्रैवल पर उपलब्ध है.)

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