हाथियों के साथ चाय की चुस्की, कभी सोचा है?

  • 8 अक्तूबर 2019
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ज़्यादातर लोग सोचते हैं कि संसार में हाथियों की आबादी घटने के पीछे उनका शिकार ही सबसे बड़ी वजह है.

लेकिन एक और वजह है जिसकी ओर कम लोगों का ध्यान जाता है. वह है चाय.

पूर्वोत्तर भारत में चाय के बागान उन इलाकों में हैं जो एशियाई हाथियों का सबसे बड़ा निवास स्थान है.

चाय के बागानों में पानी निकासी के लिए खोदी गई गहरी खाइयां, हानिकारक कीटनाशक और बिजली के तारों से की गई बाड़ हाथियों के लिए ख़तरनाक हैं, कभी-कभी जानलेवा भी.

भारत और भूटान के बीच लुप्तप्राय हो रहे हाथियों के प्राकृतिक प्रवास मार्गों पर स्थित चाय बागानों में ये सारे उपाय किए जाते हैं.

हाथियों से चाय बागानों की दुश्मनी

हाथी चाय की पत्तियां नहीं खाते, लेकिन लंबे प्रवास के दौरान वे अक्सर चाय के बागानों से होकर गुजरते हैं. वहां उन्हें शत्रुता रखने वाले इंसानों का सामना करना पड़ता है.

पिछले 75 सालों में, भारत में एशियाई हाथियों की आबादी आधी रह गई है. एक अनुमान है कि 2018 में इंसानों और हाथियों के बीच हुए संघर्ष में 64 लोगों की मौत हुई.

2014-15 में सिर्फ़ असम में हाथियों के साथ संघर्ष में 54 लोग मारे गए थे. हाथियों को भी नुकसान उठाना पड़ा.

असम के चाय किसान तेनज़िंग बोडोसा ने इंसानों और हाथियों के बीच सहजीवी संबंध बनाने का अपना तरीका ढूंढ़ा है.

काचीबाड़ी गांव के तेनज़िंग बोडोसा अपने परिवार में पहली पीढ़ी के चाय उत्पादक हैं. उनका तीन हेक्टेयर का चाय बागान हाथियों को दोस्ताना माहौल देता है.

Image caption तेनज़िंग बोडोसा

ताकि महफूज़ रहें हाथी

बोडोसा के आसपास के चाय बागान हाथियों को दूर रखने के लिए जिन तरीकों का इस्तेमाल करते हैं, वह उनमें से किसी तरीके को नहीं अपनाते.

उनके चाय के खेतों के चारों ओर पानी निकासी के लिए गहरी खाइयां नहीं हैं, न ही उन्होंने बिजली के नंगे तारों से अपने बागान को घेरा है.

वह बिना किसी नुकसान या चोट लगने के ख़तरे के हाथियों को अपने खेतों से होकर गुजरने देते हैं.

बोडोसा के चाय बागान में काम करने वाले मजदूर भी हाथियों को नहीं भगाते, बल्कि उनको शांति से घूमने देते हैं.

इससे हाथियो को खदेड़ने का प्रयास करते समय होने वाले संघर्ष से लगने वाली चोटें और मौतें कम हुई हैं.

तेनज़िंग बोडोसा कहते हैं, "हर साल जंगली हाथी चाय बागानों के नालों में गिरते हैं और उनकी मौत हो जाती है. ख़ासकर हाथियों के बच्चे उनमें फंस जाते हैं. इसीलिए मैं चाय बागान में बड़ा नाला नहीं बनाता."

बोडोसा के चाय बागान में पास के तालाब से पानी लिया जाता है, जो हाथियों के लिए भी खुला है.

"उनको मेरे बागान में खूब पानी मिलता है, इसलिए वे यहां बहुत खुश रहते हैं. यहां हाथियों और इंसानों के बीच का संघर्ष कम हो रहा है."

खाद और कीटनाशक से दूर

बोडोसा के चाय बागान में रासायनिक कीटनाशकों या उर्वरकों का भी इस्तेमाल नहीं होता, क्योंकि ये हाथियों के लिए और उन वनस्पतियों के लिए ज़हरीले हो सकते हैं जिनको हाथी खाते हैं.

वह कहते हैं, "कई किसान बहुत अधिक रासायनिक खाद और कीटनाशकों का प्रयोग कर रहे हैं. मैं सूखे पत्तों को इकट्ठा करके अपना जैविक खाद बनाता हूं."

बोडोसा के बागान की सबसे बड़ी ख़ासियत है इसका बफ़र ज़ोन, यानी वह जगह जहां बागान ख़त्म होता है और जंगल शुरू होता है.

ज़्यादातर चाय उत्पादक किसान अपने बागान के इर्द-गिर्द उन पेड़ों को काट देते हैं जिनकी पत्तियों और हरी डालियों को हाथी चाव से खाते हैं.

उनके उलट बोडोसा अपने बागान के चारों ओर ऐसे ही पेड़ लगाते हैं. वे बांस लगाते हैं, कमरख के पेड़ लगाते हैं और वे सारे पेड़ जो हाथियों को पसंद हैं.

वह कहते हैं, "मैं यहां जंगल का संरक्षण करता हूं. मैंने उनकी पसंद के कई पेड़ लगाए हैं जैसे बांस, कटहल, बेल, अमरख वगैरह. मैं सभी तरह के पेड़ों का संरक्षण करता हूं मौर मेरा अपना जंगल है."

"जब जानवर जंगल से बाहर आते हैं और जब मैं उनको देखता हूं तो मुझे बड़ी खुशी होती है."

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हाथी संरक्षण का सर्टिफिकेट

बोडोसा की कोशिशें बेकार नहीं गई हैं. उनकी तरफ लोगों का ध्यान गया है और हाथियों का भी.

उन्होंने अब तक 30 हज़ार किसानों को चाय की खेती के अपने तरीकों के बारे में प्रशिक्षित किया है.

वाइल्डलाइफ फ्रेंडली एंटरप्राइज नेटवर्क ने प्रमाणित किया है कि बोडोसा का चाय बागान दुनिया का इकलौता चाय बागान है जो हाथियों के अनुकूल है.

इस सर्टिफिकेट से वह भी बहुत ख़ुश हैं. उनके चाय बागान में इसका बोर्ड लगा है जहां खड़े होकर वह कहते हैं, "यह दुनिया का पहला एलीफैंट फ्रेंडली प्रमाणित चाय बागान है."

हाथियों के साथ एक प्याली चाय

हर साल दुनिया भर से करीब 100 सैलानी बोडोसा के चाय बागान आते हैं. कुछ सैलानी तो उनके साथ कई महीने गुजारते हैं ताकि वे उनके तौर-तरीकों से पूरी तरह परिचित हो सकें.

बोडोसा मेहमानों को आमंत्रित करते हैं कि वे चाय बागान के काम में हाथ बंटाएं और वहां उगाई जाने वाली ऑर्गैनिक चाय की तीन किस्मों को चखकर उनका स्वाद लें.

मेहमानों के लिए उन्होंने बागान के बीच में कॉटेज बनवाए हैं. जाहिर है यहां उनको बागान से गुजरने वाले हाथियों को भी देखने का मौका मिलता है.

जैविक ऊर्जा की छात्र वेरोनिका फ़ेन्डेल यहां की मेहमान हैं. वह करीब 4 साल पहले तेनज़िंग बोडोसा से मिली थीं. अब वह दोबारा उनसे मिलने आई हैं.

"उन्होंने मुझे ऑर्गैनिक खेती के बारे में सब कुछ बताया कि वे कैसे हाथियों को बचा रहे हैं. मुझे लगता है कि वे सचमुच शानदार काम कर रहे हैं."

बोडोसा कहते हैं, "यदि हम अपना चाय बागान बना सकते हैं तो हम अपना जंगल क्यों नहीं बना सकते?"

"यदि हम कंक्रीट से एक बड़ा शहर बना सकते हैं तो शहर के बीच सिटी फॉरेस्ट क्यों नहीं बना सकते?"

"हम आदिवासी लोग हैं. हम पंचतत्वों की पूजा करते हैं. जल, वायु, अग्नि पृथ्वी के साथ हम प्रकृति की पूजा करते हैं."

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