जापान के इस कुंड में नहाने के लिए 4 दिन पैदल चलते हैं लोग

  • 26 अक्तूबर 2019
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जापानी आल्प्स पहाड़ों पर कुरोबे नदी के बगल में एक छोटा मगर दूधिया-नीले पानी का गर्म कुंड है, जहां मैं नहाने पहुंची थी.

वहां पास में ही पीले रंग की कुछ बाल्टियां थीं जो कुंड में उतरने से पहले नहाने के काम आती थीं. पास के पत्थरों पर कपड़े फैले थे.

यह कुंड किसी लग्जरी स्पा जैसा नहीं था, लेकिन यही तो इसकी ख़ूबसूरती थी.

पिछले 1,000 साल से ज़्यादा समय से कुदरती गर्म कुंड (जिसे जापान में ऑनसेन कहा जाता है), यहां की ज़िंदगी का अहम हिस्सा रहे हैं. यहां शरीर और आत्मा दोनों की सफाई होती है.

जापान में 3,000 से ज़्यादा गर्म कुंड हैं, जिनका पानी खनिजों से भरा है. धरती के नीचे से गर्म पानी बुलबुले के साथ ऊपर आते हैं.

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बिना कपड़ों के नहाना

लोग अपने परिवार, दोस्त और पड़ोसियों के साथ यहां आते हैं और एक साथ बिना कपड़ों के नहाते हैं.

कुछ गर्म कुंड शहरों में हैं जहां स्मार्ट स्पा बन गए हैं. कुछ कुंड समुद्र किनारे की गुफाओं में भी हैं. सबकी अपनी-अपनी ख़ासियतें हैं. लेकिन एक कुंड सबसे अलग है.

ताकामागहारा (शाब्दिक अर्थ- स्वर्ग के उच्च मैदान) जापान में सबसे दूरदराज का गर्म कुंड है. यहां पहुंचने में दो दिन लगते हैं. जो लोग नहाने के लिए यहां आते हैं उनके लिए यह सच्चे तीर्थ की तरह है.

चुबु-सांगकू नेशनल पार्क में स्थित इस कुंड तक पहुंचने के लिए ऑनसेन के दीवाने जंगलों और नदियों में 40 किलोमीटर ट्रेक करते हैं.

वे खड़ी चढ़ाई करते हैं और पहाड़ों पर बनी सुनसान झोपड़ियों में रात बिताते हैं. इस सफर में शारीरिक क्षमता के साथ-साथ पहाड़ों के मनमौजी मौसम की समझ की ज़रूरत होती है.

जापान के हर गर्म कुंड में खनिजों और पत्थरों की बनावट अलग है, लेकिन कुदरत के साथ रिश्ता सबमें आम है.

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खुले आसमान के नीचे स्नान

तेज़ी से शहरीकृत हो रही दुनिया में रोटेनबुरो यानी खुले आसमान के नीचे स्नान की मांग बढ़ रही है.

टिमटिमाते तारों से भरे आसमान के नीचे ठंडी हवा में लोग खनिजों से समृद्ध पानी में नहाने के लिए उतरते हैं.

सभ्यता से मीलों दूर अल्पाइन पेड़ों से घिरे ताकामागहारा के कुंड में रोटेनबुरो के अनुभव की पराकाष्ठा मिलती है.

जंगलों-पहाड़ों में चार दिन की यात्रा कठिन लग सकती है, लेकिन जापान की पारंपरिक तीर्थयात्रा सदियों पुरानी है. मंजिल को छोड़ दें तो यह उसी तरह की यात्रा है.

ताकामागहारा जिन पहाड़ियों से घिरा है वहां एडो-युग (1603 ई.-1868 ई.) के तीर्थयात्री आते थे. पहाड़ियों को पूजा जाता था और इनको जापान के स्वदेशी शिंटो धर्म की आत्माओं (कामी) का प्रतीक माना जाता था.

गर्म कुंड में नहाना मुझे भी पसंद है. जापान के किसी गर्म कुंड में नहाने की यह मेरी पहली यात्रा नहीं थी, लेकिन यकीनन यह सबसे मुश्किल यात्रा थी.

पहली बार मैं सर्दियों में होक्काइडो के कुंड में गई थी. वहां गर्म पानी में दोस्तों से बातें करते हुए घंटों बीत गए थे.

पांच साल बाद गर्मियां ख़त्म होते ही फिर से पहाड़ की यात्रा करके गर्म कुंड तक जाने की योजना बनी.

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सफर की शुरुआत

मैंने टोक्यो से तोयामा जाने के लिए देर रात की बुलेट ट्रेन पकड़ी. अगली सुबह दो घंटे की बस यात्रा के बाद मैं ओरिटेट नामक एक छोटे गांव पहुंची.

यहां से ढलानों और पथरीले रास्तों की खड़ी चढ़ाई शुरू हो गई. अपने पार्टनर की रफ़्तार के साथ तालमेल बनाते हुए मैं चलती रही.

पत्थरों को काटकर बनाए गए संकरे रास्तों पर चलते हुए मेरी सांस फूलने लगी फिर भी मैं रूकी नहीं.

रास्ते में कई लोगों ने "कोन्निचिवा" (नमस्ते) किया. दो पश्चिमी देशों के नागरिकों ने "हैलो" किया. यानी उस रास्ते पर हम अकेले नहीं थे.

हम और आगे बढ़े तो पहाड़ों पर धुंध छा गई. पूरा परिदृश्य बदल गया. मोबाइल फोन के सिग्नल चले गए.

पथरीला रास्ता जल्द ही ख़त्म हो गया. उसकी जगह लकड़ी के तख्तों से बनाया रास्ता शुरू हो गया. जमीन पर उगी अल्पाइन वनस्पतियों को बचाने के लिए इनको तैयार किया गया है.

लकड़ी के तख्तों से बना यह रास्ता सुंदर लगता है. जहां तक नज़र जाती है बस यही नज़र आता है. आगे बढ़ने पर हमें घास में रंगीन अल्पाइन फूल दिखे जो सीजन के आख़िरी फूल थे.

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पहाड़ पर सराय

सर्दियां शुरू होने वाली थीं. अगले कुछ ही हफ्तों में पहाड़ों पर बनी सरायें (यामगोया) बंद हो जाएंगी. इन सरायों तक हर महीने हेलीकॉप्टर से सप्लाई पहुंचाई जाती है. यहां के स्टाफ यहीं रहते हैं.

इनके होने का फायदा यह है कि मुसाफिरों को भारी सामान लेकर आने की ज़रूरत नहीं होती.

यहां घर का बना खाना मिलता है. दूरदराज के पहाड़ों में बाहरी दुनिया से एकमात्र संबंध इन्हीं सरायों का नेटवर्क है.

यहां से मुसाफिर कों आगे का रास्ता और अनुमानित मौसम के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है ताकि कोई लापता न हो जाए.

पहले यामगोया (तारोडायरा) पहुंचकर हमने नेपाली करी खाई और अपने बोतलों में पहाड़ों का ताजा पानी भरा.

हम जिस सराय (याकुशिज़ावा) में रात बिताने वाले थे उसका तिरछा ढांचा 12 किलोमीटर दूर से दिखा.

सालों साल के मौसम को सहते हुए भी लकड़ी की यह सराय मज़बूत थी. डोरमेट्री की ओर ले जाते हुए हमारे मेज़बान ने इसका भरोसा दिया.

वहां टाटामी मैट बिछी थी और कंबल करीने से लगे हुए थे. यह साधारण सेट-अप था, लेकिन अंदर रात में रुकने वाले कई मेहमान भरे हुए थे.

हमारी बालकनी कुरोबे नदी की तरफ थी. कुछ हाइकर्स मछली पकड़ने के लिए नदी की ओर जाने की तैयारी कर रहे थे.

रात के खाने में चावल के साथ कुरकुरा टेंपुरा परोसा गया. सभी लोग बहुत भूखे थे. सूप और चाय के साथ हमारा भोजन पूरा हुआ.

हम अपने पड़ोसियों के करीब बैठे और बातें कीं. लोगों ने जोश में गाने गए और बीयर के गिलास उठाकर चियर्स किया.

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सामुदायिक स्नान

सामुदायिक स्नान दोस्तों, परिवार और सहयोगियों के साथ करीब से जुड़ने का मौका देता है. साथ-साथ नहाते हुए लोग ऊंच-नीच के संबंधों को धो देते हैं और खुलकर बातें करते हैं.

यह अवधारणा हदाका नो त्सुकियाई (नंगी दोस्ती) के नाम से जानी जाती है. साझे स्नान की अंतरंगता सारी बाधाओं को हटा देती है. जब सभी लोग नंगे होते हैं तो सभी लोग बराबर होते हैं.

असल में ऑनसेन का शांत परिवेश एक अनकहे सामुदायिक कोड के नाजुक संतुलन पर टिका होता है.

जूते उतारने से लेकर कुंड के बाहर खुद को साफ करने तक का शिष्टाचार रोजमर्रा की भागमभाग से बहुत अलग होता है.

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दूसरे दिन का सफर

अगली सुबह हम सूरज उगने से पहले उठे. हमने चावल, आलूबुखारे का अचार, सूप और ऑमलेट खाया. अपने मेज़बान का शुक्रिया अदा करके हम आगे चल पड़े.

लकड़ी के तख्तों पर ट्रेक करते हुए और टूटे हुए तख्तों को फांदते हुए हम धीरे-धीरे कुमनोदैरा पठार की तरफ बढ़ते रहे.

पथरीले रास्ते पर एक जगह हमें दो बुजुर्ग यात्री मिले जो बड़ी सावधानी से चल रहे थे. पेड़ की एक डाल की ओर इशारा करते हुए वे जोर से बोले- "ब्लू बेरीज़!"

दोस्तों ने बताया कि वे हर साल पूरे जापानी आल्प्स की यात्रा करते हैं. वे यात्रा कठिन होने के मेरे दावे को ख़ारिज करते हैं.

वे इन पहाड़ों पर तब से आ रहे हैं जब वे 10-10 साल के थे. बाद में उन्होंने के2 और एवरेस्ट की भी चढ़ाई की थी.

उन्होंने हमें भरोसा दिलाया कि हम ऑनसेन का लुत्फ उठाएंगे. उन्होंने हमें शुभकामनाएं दीं.

सीढ़ियां चढ़ते हुए और संकरे पुलों को पार करते हुए हम आख़िरकार ताकामागहारा तक पहुंच गए.

हमने अपने बैग नीचे रख दिए और करीब 20 मिनट के पथरीले रास्ते पर नीचे उतरे जहां गर्म पानी का मशहूर कुंड था. वहां सल्फर की ख़ुशबू उठ रही थी.

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तीन स्नान कुंड

ताकामागहारा में पुरुषों और महिलाओं के लिए दो अलग कुंड हैं जिनको साधारण बांस से ढंका गया है. एक तीसरा साझा कुंड भी है जो पूरी तरह खुला है.

पुरुषों और महिलाओं का साथ-साथ नहाना (कोनोकू) जापान में 19वीं सदी तक आम था. लेकिन अब सिर्फ़ कुछ ग्रामीण इलाकों के गर्म कुंडों में ही यह परंपरा बची है.

जब हम पहुंचे तो साझे कुंड के हल्के नीले पानी में दो नग्न बुजुर्ग पुरुष पहले से थे.

मैं महिलाओं के कुंड का दरवाजा देखते हुए आई थी. मैं वहां पहुंचे लोगों से कुछ बातचीत करने लगी, जिनमें से एक ने माना कि उनको ऑनसेन-मैनिया है.

उन्होंने बताया कि वह आठ दिनों की यात्रा करके गिफ़ू प्रांत से तागामागहारा पहुंचे हैं क्योंकि उनको खुले आसमान के नीचे नहाना अच्छा लगता है.

आसपास के परिवेश की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा, "इससे अच्छा और भला क्या होगा?

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सफ़र का मेरा साथी नये दोस्तों के साथ नहाने चला गया. मैं महिलाओं के कुंड में चली आई.

कुंड के चारों तरफ साधारण पत्थर लगे थे और कपड़े बदलने के लिए वहां लकड़ी का स्टॉल था.

मैं पूरी तरह अकेली थी. दूसरी तरफ नहा रहे लोगों से एक पर्दा था लेकिन दूर के पेड़ और पहाड़ साफ दिख रहे थे.

मैं कुंड के पानी में घुस गई. पैदल चढ़ाई करने की सारी थकान मिट गई. फिर मैं और गहराई में चली गई जहां पानी मेरे कंधों के ऊपर तक था.

यात्रा शुरू करने से पहले मैंने सोचा था कि प्रकृति के साथ होने का मतलब मोटे तौर पर अकेले होना है. मैंने कभी किसी साझे कुंड में नहाने के बारे में नहीं सोचा था.

जब मैंने गर्म पानी में अपनी बांहें फैलाईं तो मुझे जापानी कहावत "काचौ फ़ुगेत्सू" की याद आ गई. इसका शाब्दिक अर्थ है "फूल, चिड़िया, हवा और चांद".

लेकिन यह मुहावरा कुदरत की ख़ूबसूरती का अनुभव करने और इस मौके का उपयोग ख़ुद को समझने के लिए करने का महत्व बताता है.

मैंने महिलाओं के कुंड में नहाने के अपने अनुभव और जापान के साझे स्नान की पुरानी परंपरा के बारे में सोचा. मैं हिचकिचाते हुए महिलाओं के कुंड से निकल गई.

पीली बाल्टियों से फटाफट छींटे मारकर मैं साझे कुंड में दूसरे लोगों के साथ नहाने और जापान में "स्वर्ग के उच्च मैदानों" में सामुदायिक ऑनसेन के आनंद का अनुभव करने के लिए उतर गई.

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