एक पौधे ने कैसे एक जापानी द्वीप को बचाया?

  • 13 जनवरी 2020
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79 साल की इको कवाउजी एक हाथ में बेंत की छड़ी और दूसरे में कुल्हाड़ी लेकर धीरे-धीरे चलती हैं. लेकिन अपनी सीट पर बैठ जाने के बाद उनकी कुल्हाड़ी तेज़ी से चलने लगती है.

वह साइकैड पौधे (जापानी में सोतेत्सु) के तने को छीलती हैं और अंदर का गूदा निकालती हैं, ठीक उसी तरह जैसे उनके दादा-दादी ने कई साल पहले सिखाया था.

पूरे जापान में किसी भी दूसरी जगह पर लोग इस ज़हरीले पौधे से दूर ही रहते हैं. कच्चा खाने पर साइकैड अंदरूनी रक्तस्राव, लिवर को नुकसान, यहां तक कि मौत की भी वजह बन सकता है.

लेकिन जापान के दक्षिणी-पश्चिमी मुख्य द्वीप क्युशु और ओकिनावा से 300 किलोमीटर दूर अमामी ओशिमा द्वीप का इतिहास बहुत अलग रहा है.

यह द्वीप टोक्यो के मुक़ाबले ताइवान के ज़्यादा करीब है. यहां की उष्णकटिबंधीय जलवायु में साइकैड पनप जाता है. लोग अक्सर इसे पाम समझने की भूल करते हैं.

साइकैड करीब 28 करोड़ साल से मौजूद हैं और जीवित जीवाश्म माने जाते हैं.

जुरासिक काल में ये इतनी ज़्यादा तादाद में थे कि उसे अक्सर साइकैड युग भी कह दिया जाता है.

साइकैड में पाए जाने वाले न्यूरोटॉक्सिन को डायनासोर बिना किसी दिक्कत के पचा लेते थे, लेकिन इंसानों के लिए यह घातक है.

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मुश्किल दिनों का खाना

अमामी ओशिमा के 67 हजार निवासियों के लिए साइकैड ने कठिन वक़्त में उनका साथ दिया है.

सदियों से यहां के लोगों ने इन ज़हरीले पौधों की खेती करना और उसके ज़हर को निकालना सीख लिया है. इस काम में 4 हफ़्ते लगते हैं.

वे तने के अंदर से गूदा निकालते हैं. उसे पीसकर आटा बनाते हैं. उसे कई बार धोकर और सुखाकर उसके ज़हर को बाहर निकाल देते हैं.

इससे उनको सागो स्टार्च मिलता है जिसे नारि कहा जाता है. इससे नूडल्स बनाए जाते हैं या चावल में मिलाकर पकाया जाता है.

तोशी फुकुनागा, कवाउजी और उनकी दो बुजुर्ग सहेलियां द्वीप के उन आख़िरी लोगों में शामिल हैं जिनको पता है कि साइकैड से खाना कैसे निकालना है. फुकुनागा इसे मेहनत का काम बताती हैं.

समुद्र तट पर बसे इकेगाशी गांव में सिर्फ़ 55 लोग रहते हैं. यहां साइकैड्स स्वाभाविक रूप से उगते हैं और कुछ पेड़ लगाए भी गए हैं.

जापान के कई हिस्सों की तरह इकेगाशी में बूढ़ों की आबादी ज़्यादा है. युवा न सिर्फ़ इकेगाशी से चले गए हैं बल्कि उन्होंने अमामी ओशिमा द्वीप भी छोड़ दिया है.

ज़्यादातर युवा या तो क्युशु द्वीप के कागोशिमा शहर चले गए हैं या काम की तलाश में जापान के बड़े शहरों की ओर चले गए हैं.

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सिखाने वाला कोई नहीं

कहते हैं कि सीखने की उम्र कभी ख़त्म नहीं होती, लेकिन यहां के पेंशनभोगियों के लिए आप कुछ सिखाने के लिए बहुत बूढ़े हो सकते हैं.

साइकैड का गूदा और उससे ज़हर निकालने की विधि बहुत पेचीदा है जिसे सिखाने में उनको कोई फायदा नहीं दिखता.

25 साल के केंशी फुकुनागा इकेगाशी में रहने वाले इकलौते नौजवान हैं. उन्होंने सोतेत्सु से खाना तैयार करने की विधि सीखने की कोशिश की. लेकिन उनकी दादी तोशी कहती हैं, "हम कुछ सिखाने के लिए अब बहुत बूढ़े हो चुके हैं."

इस गांव पहुंचने से एक दिन पहले मैंने अमामी म्यूजियम में वक़्त बिताया था, जो द्वीप के मुख्य शहर अमामी (नाज़े) में है.

म्यूजियम के अधिकारी नाबुहिरो हिसाशी ने द्वीप के लिए इस पौधे का इतिहास और महत्व बताया.

इडो काल (1603-1868) के दौरान अमामी ओशिमा सत्सुमा कबीले के अधीन था. उसका क्षेत्र आज के जापान का दक्षिणी कागोशिमा प्रांत है.

इस द्वीप पर अक्सर समुद्री तूफान आते थे और पारंपरिक खेती करना बहुत मुश्किल था. लेकिन यह जापान के उन गिने-चुने इलाकों में से एक था जहां गन्ने की खेती हो सकती थी.

हिसाशी कहते हैं, "सत्सुमा शासक गुड़ के बदले चावल भेजते थे. अगर गन्ने की फसल खराब हो जाती तो अमामी ओशिमा के लोग भूखों मरते. ऐसे बुरे वक़्त में साइकैड खाना पड़ता था."

इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं कि लोगों ने साइकैड को सुरक्षित खाने का तरीका कैसे खोजा. हिसाशी का अनुमान है कि लोगों ने इसके लिए ख़तरे उठाए होंगे.

म्यूजियम अब इसकी खेती और कटाई के तरीकों का दस्तावेज तैयार करना चाहता है.

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दूसरे विश्वयुद्ध के बाद

सत्सुमा शासकों का अत्याचार 1868 में इडो काल की समाप्ति के साथ ही ख़त्म हो गया. लेकिन पहले और दूसरे विश्व युद्ध में द्वीप वासियों का प्राचीन साइकैड ज्ञान फिर से काम आने लगा.

युद्ध के दौरान जापान के मुख्य द्वीपों से सप्लाई लाइन कट गई जिससे यहां के लोगों के सामने खाने का संकट खड़ा हो गया. ज़िंदा रहने के लिए लोगों ने दोबारा साइकैड्स की ओर रुख किया.

हिसाशी कहते हैं, "कोई नहीं जानता कि यह तरीका कितना पुराना है, लेकिन यह हमारे द्वीप के लिए बहुत अहम है. अब हम इस पर किताबें तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि लोग भूल न जाएं."

साइकैड के इतिहास और इसकी अहमियत के बावजूद इकेगाशी के ज़्यादातर लोगों को इस परंपरा के नष्ट होने में कोई परेशानी नहीं है.

यहां के बूढ़ों ने दूसरे विश्व युद्ध के बाद के कुछ दिनों में सोतेत्सु खाया था. उस दौर के कुछ लोग अब भी उन दिनों को "सोतेत्सु जिगोकु" या "साइकैड नर्क" कहते हैं.

क्या वे इसीलिए इसे संरक्षित नहीं करना चाहते? क्या इससे जुड़ी यादें बहुत तकलीफदेह हैं?

फुकुनागा इंकार करते हैं. "तब हम सब जवान थे. मुझे इसका स्वाद भी याद है. अगर सोतेत्सु नहीं होता तो हम सब मर जाते."

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सोतेत्सु की ज़रूरत नहीं

ज़हरीले भोजन के प्रति लगाव घटने के पीछे की सच्चाई थोड़ी अधिक व्यावहारिक है.

अमामी ओशिमा जापान के अन्य 6,851 द्वीपों की तरह समृद्ध नहीं है, लेकिन अतीत से तुलना करें तो मौजूदा समय बहुत बेहतर है.

आज उनको किसी शोषक सेना की चिंता नहीं है. भरपूर आयातित अनाज उपलब्ध है और खेती के तरीके भी उन्नत हो गए हैं.

साइकैड खाने की मज़बूरी नहीं है, इसलिए इसके लिए की गई मेहनत लोगों को व्यर्थ लगती है.

ज़हरीले पेड़ का तना काटकर उससे खाना निकालना बहुत मुश्किल काम है. इसमें विषैले वाइपर हाबू का भी ख़तरा रहता है.

फिर भी कवाउजी, तोशी और उनकी दो सहेलियां हर साल कुछ साइकैड तैयार करती हैं. उन्होंने इसे चावल के साथ पकाकर मुझे चखने के लिए दिया.

चारों महिलाएं मुझे घेरकर खड़ी हो गईं. उन्हें देखकर मेरे हाथ थरथराने लगे. यह खाना मेरी जान ले सकता है.

पहला निवाला मुंह में डालने से पहले मैंने पूछा कि पिछली बार इसे खाकर कब कोई गिर पड़ा था?

फुकुनागा ने कहा, "नही, नहीं कभी नहीं." मैंने झटपट कुछ चावल खा लिए.

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बेस्वाद खाना

सबसे बड़ी हैरानी ये थी कि कुख्यात ज़हरीले प्रागैतिहासिक पौधे से निकाले गए भोजन का कोई स्वाद ही नहीं था.

मैंने कुछ और चावल खाया. मुझे जापान के कुख्तात पफर फिश (फ़ुगु) की याद आ गई, जिसके बारे में कहा जाता है कि उसे पकाने में जरा-सी लापरवाही भी जान ले सकती है.

इसमें कोई हैरानी नहीं कि साइकैड को अब अमाम ओशिमा में ज़रूरी खाद्य स्रोत नहीं माना जाता. फिर भी इकेगाशी की महिलाएं अब भी सारे ख़तरे उठाकर इसे कभी-कभार पकाती हैं.

अमामी ओशिमा में एक रेस्तरां भी है जहां यह खाना परोसा जाता है. यह छोटा उडोन रेस्तरां अमामी एयरपोर्ट से कुछ ही मील की दूरी पर मैश यदुरी नाम से चलता है.

इसकी जगह को लेकर कोई निश्चित नहीं था. लेकिन मुझे समुद्र तट की तरफ जाने वाली एक संकरी सड़क के आखिर में यह मिल गया.

द्वीप के अन्य हिस्सों में साइकैड अतीत की बात हो चुकी है, लेकिन यहां की मालकिन और शेफ ताइ वडा और और उनके पति अकिहो पिछले 5 साल से साइकैड स्टार्च नूडल्स बेच रहे हैं.

वहां कोई अनुवादक नहीं था, फिर भी वडा को पता था कि मैं वहां क्यों आया हूं.

कुछ ही मिनटों बाद गर्मागर्म उमामी शोरबे वाला चिकेन और साइकैड-उडोन नूडल्स से भरा कटोरा मेरे सामने था.

ईमानदारी से कहूं तो यह भी थोड़ा बेस्वाद था, लेकिन साइकैड का इतिहास मरा नहीं था.

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