जहाज़ का मलबा जिसने दक्षिण अफ्रीका को बदल दिया

  • निक डेल
  • बीबीसी ट्रेवल
Bruno Werz

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केप टाउन के डॉल्फिन बीच होटल की पार्किंग में डॉ. ब्रूनो वर्ज़ से मुलाक़ात के बाद हम टेबल खाड़ी तट की ओर बढ़ चले.

टेबल माउंटेन के सामने पर्यटक सेल्फी ले रहे थे. काइट सर्फर ब्लूबर्ग बीच की ओर रेस लगा रहे थे. वर्ज़ ने तट से क़रीब 60 मीटर दूर एक जगह की ओर इशारा किया.

"मुझे 95 फीसदी यक़ीन है कि जहाज़ का मलबा वहीं है. इसका मतलब है कि बचे हुए नाविकों शिविर हमारे पीछे के टीलों में कहीं दफ़न है."

25 मार्च 1647 को यानी डच ईस्ट इंडिया कंपनी VOC के केप ऑफ़ गुड होप के उत्तर में केप टाउन बस्ती बसाने से 5 साल पहले न्यू हारलेम जहाज टेबल खाड़ी के उथले पानी में डूब गया था.

सौभाग्य से किसी की जान नहीं गई और एशिया से दक्षिण अफ्रीका के रास्ते नीदरलैंड जा रहे जहाज़ में लदे बेशकीमती माल को निकाल लिया गया था.

हादसे के कुछ दिन बाद चालक दल के 58 सदस्यों को दूसरे जहाज़ से नीदरलैंड ले जाया गया. लेकिन 62 लोग कीमती मसालों, काली मिर्च, कपड़े और चीनी मिट्टी के बर्तनों की देखरेख के लिए वहीं रह गए.

करीब एक साल बाद एक बड़ा जहाज़ उनको माल सहित ले जाने के लिए आया, तभी वे सब घर लौट सके.

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इतिहास बदलने वाली घटना

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जोहान्सबर्ग यूनिवर्सिटी के इतिहासकार गेराल्ड ग्रोएनवाल्ड का कहना है कि अगर वे यहां नहीं रुके होते तो दक्षिण अफ्रीका का औपनिवेशिक इतिहास कुछ अलग होता.

पीने का पानी और राशन लेने के लिए डच और यूरोपीय जहाज़ 1590 के दशक से ही टेबल खाड़ी और सल्दान्हा खाड़ी में रुक रहे थे.

न्यू हारलेम के चालक दल के तजुर्बे से ही यह तय हुआ कि कौन सी यूरोपीय ताक़त वहां सबसे पहले बसेगी और किस जगह बसेगी.

डच लोगों ने केप टाउन को चुना. ग्रोएनवाल्ड के मुताबिक़, "1652 के बाद अंग्रेजों ने सेंट हेलेना पर ध्यान देना शुरू किया. फ्रांसीसी सल्दान्हा की खाड़ी में आते-जाते रहे. रीयूनियन में उनकी भी अपनी कॉलोनी थी."

वर्ज़ ने नीदरलैंड में मरीन आर्कियोलॉजिस्ट के रूप में करियर शुरू किया था. 1988 में केप टाउन यूनिवर्सिटी में लेक्चरार बनकर वह दक्षिण अफ्रीका चले आए.

उनके आने के कुछ ही हफ़्ते बाद एक महिला ने उन्हें फोन करके बताया कि उसे लगता है कि उसने न्यू हारलेम के अवशेषों को खोज लिया है.

वर्ज़ केप के पास डूबे VOC के जहाज़ों के अवशेषों को खोजने की उम्मीद लेकर दक्षिण अफ्रीका आए थे. हारलेम को खोजना उनकी सूची में सबसे ऊपर था.

"वह मुझे समुद्र तट पर ले गई और कुछ लकड़ियां दिखाईं." लेकिन वर्ज़ तुरंत ही पहचान गए कि वे 19वीं सदी के मलबे थे.

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जहाज़ के मलबे की तलाश

निराशा को पीछे छोड़कर वह हॉबी की तरह न्यू हारलेम की तलाश में लगे रहे. जब भी वह ऊब जाते, तट की तरफ टहलने चले जाते. वह हेग और केप टाउन के सरकारी अभिलेखागारों में भी जाकर जानकारियां जुटाते.

इसी शोध के दौरान उन्हें जहाज़ के जूनियर मर्चेंट लीन्डर्ट जांस्ज़ के कुछ दस्तावेज़ मिले. जांस्ज़ उन 62 लोगों में थे जो जहाज डूबने के बाद केप टाउन में रुक गए थे.

उन दस्तावेज़ से वर्ज़ को उस एक साल की अवधि के बारे में काफी कुछ पता चला जब 62 नाविक केप में रुके थे. उनमें जहाज के मलबे की सही लोकेशन के बारे में भी कुछ अहम सुराग थे.

1647 में जहाज़ पर लदे भारी माल को तट तक लाने में बहुत मुश्किल हुई थी. इसमें कई हफ्ते लग गए थे और एक जान भी चली गई थी.

उन्होंने एक टीले पर शिविर बनाया था, जिसे वे ज़ैन्डेनबर्क (अंग्रेजी में सैंडकैसल) कहते थे.

वे स्थानीय खोई लोगों से राशन और ताज़ा मांस खरीदते थे और पास के साल्ट रिवर से मछलियां पकड़ते थे. वे रॉबेन द्वीप भी जाते थे (नेल्सन मंडेला को 1964 से 1982 के बीच इसी द्वीप में क़ैद रखा गया था.)

जांस्ज़ के दस्तावेज़ से उनकी चुनौतियों और क़ामयाबी के तजुर्बे का अंदाज़ा मिलता है.

"शनिवार, 15 जून को नाविक दल ने शिविर के पास एक गैंडे को गोली मारी (जो हाथी से लड़ रहा था). उसका मांस बहुत अच्छा था, जो मुफलिसी के समय बहुत काम आया."

"अगले दिन हमारा दल रॉबेन आइलैंड से 200 पक्षियों (जिनमें ज़्यादातर पेंगुइन थीं) और 800 अंडों के साथ लौटा."

मुश्किलातों के बावजूद जांस्ज़ ने डच जहाजों के लिए केप की उपयोगिता को पहचान लिया था. उन्हें बस VOC के 17 निदेशकों को राजी करना था कि वे केप में स्थायी बस्तियां बसाएं.

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बस्तियों की ज़रूरत

केप में बस्ती बसाना डच नाविकों के लिए बहुत अहम था, क्योंकि एशिया से आने-जाने में 8 महीने का समय लगता था और इस दौरान स्कर्वी और अन्य बीमारियों से कई मौतें हो जाती थीं.

VOC के जहाज़ दक्षिणी गोलार्ध में कई जगहों पर हादसे के शिकार होते थे, ख़ास तौर पर सेंट हेलेना, मॉरीशस और टेबल खाड़ी में.

फिर भी कंपनी अफ्रीका में बस्ती बसाने को लेकर हिचक रही थी. इसकी दो वजह थी- एक तो ख़र्च और दूसरा वहां पहले से बसे लोग.

1648 में हॉलैंड लौटने पर जांस्ज़ और प्रूट नाम के दूसरे अधिकारी ने कंपनी के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स को बताया कि केप ऑफ़ गुड होप में एक किला और बागीचा बनाने से क्या-क्या फायदा होगा.

उन्होंने केप के रणनीतिक स्थिति, उपजाऊ जमीन, मछलियों और मवेशियों की भरमार, ताज़े पानी और इमारती लकड़ियों तक पहुंच के बारे में बताया.

सबसे अहम बात यह बताई कि स्थानीय लोग सामान की अदला-बदली के लिए मवेशियां और भेड़ लेकर दोस्ताना माहौल में आते हैं.

बोर्ड के निदेशकों को मनाया गया कि वहां कितने सस्ते में सेटलमेंट बनाया जा सकता है. अफ्रीका के मूल निवासी नरभक्षी हैं- इस लोकप्रिय धारणा को बेवकूफी बताया गया.

जांस्ज़ ने उन्हें समझाया कि उनके लोगों की हत्याएं मवेशियां चुराने की वजह से हुईं, न कि मूलवासियों के नरभक्षी होने के कारण.

जांस्ज़ ने यह सलाह भी दी थी कि "नये सेटलमेंट का कमांडर ऐसा हो जो मूल वासियों के साथ विनम्रता से पेश आए, उनको हर चीज़ की सही कीमत दे और कुछ लोगों को भरपेट खाना खिलाए".

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पहला कमांडर

लेकिन ऐसा हुआ नहीं. VOC के एक महत्वाकांक्षी अधिकारी जान वान रिबीक को केप का पहला कमांडर बनाया गया. वह 1648 में न्यू हारलेम को निकालने वाले जहाज में थे. रिबीक ने इतिहास बदलने वाले काम किए.

ग्रोएनवाल्ड कहते हैं, "पहले दिन से ही वह खोई लोगों के प्रति नकारात्मक नज़रिया रखते थे. वह उन पर जरा भी भरोसा नहीं करते थे. इसी वजह से 1658-59 में पहला खोई-डच युद्ध हुआ."

रिबीक ने डच लोगों को अंदरूनी इलाकों में जाकर खेती करने की आजादी दी. VOC की नौकरी से मुक्त किए गए शुरुआती "फ्री सिटीजन्स" ने असल में केप टाउन के पास ही खेती शुरू की. लेकिन उनकी तादाद बढ़ी तो वे अंदर बढ़ते चले गए और बस्ती फैलती चली गई.

1658 में कड़ी मेहनत करने के लिए पश्चिम अफ्रीका और हिंद महासागर के आसपास के इलाकों से गुलाम लाए गए.

यूनिवर्सिटी ऑफ़ साउथ अफ्रीका की रिटायर प्रोफेसर जेन कैरथर्स का कहना है कि इस "सामाजिक-आर्थिक कॉकटेल" ने नई सामाजिक व्यवस्था और नस्लीय वर्ग भेद की बुनियाद रखी जो 20वीं सदी में और मज़बूत हो गया.

वर्ज़ के मुताबिक हारलेम की खोज से 17वीं सदी के दक्षिण अफ्रीका के इतिहास का एक अहम हिस्सा पूरा होगा.

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इतिहास का हिस्सा

2015 तक उनका प्रोजेक्ट शौक़ से कहीं आगे निकल गया. उन्होंने जहाज के मलबे के बारे में ढेरों जानकारियां इकट्ठा कीं.

जांस्ज़ के दस्तावेज़ में ज़िक्र था कि जहाज वान रिबीक के किले से ठीक डेढ़ मील दूर था.

वर्ज़ से पहले न्यू हारलेम की तलाश करने वालों ने अंग्रेजी मील के हिसाब से दूरी का अनुमान लगाया था, लेकिन वर्ज़ को मालूम था कि डच मील अंग्रेजी मील से करीब पांच गुना बड़ा होता था.

एक और अहम सुराग 1652 के एक दस्तावेज से मिला जिसमें लिखा था कि जहाज के नाविक दल ने शिविर के पास जो कुआं खोदा वह 60 फीट गहरा था. वहां रेत, चूना पत्थर, फिर कंकड़-पत्थर, फिर मिट्टी और सबसे नीचे रेत के साथ पानी मिला था.

इन जानकारियों ने लोकेशन बारकोड का काम किया. वर्ज़ के छात्र केलेट्सो मुलेले ने 1970 के दशक के एक भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण से इसकी तुलना की जिससे शिविर और मलबे की सही स्थिति पता करने में और मदद मिली.

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2016 में वर्ज़ ने भूभौतिकीविद् बिली स्टीनकैंप के साथ मैग्नेटोमीटर (लोहे की पहचान करने वाला मेटल डिटेक्टर) से पूरे चिह्नित इलाके का सर्वेक्षण किया.

समुद्र तट पर खुदाई से 19वीं सदी के जहाज का मलबा मिला. बाड़ के डंडे, पाइप का टुकड़ा और एक मरीन इंजन ब्लॉक मिला. जब गहराई में खुदाई की गई तो उनकी तकदीर बदलने लगी.

उनको एक विशाल अर्ध-वृत्ताकार चीज़ मिली जिसे वर्ज़ एक तरह का मस्तूल मानते हैं. उनको बहुत पुराना लंगर भी मिला. उनको तांबे का एक हार भी मिला, जो शायद खोई लोगों का था.

खुदाई के औजार में फंसकर एक मीटर लंबा लंगर टूटने के बाद वर्ज़ ने खुदाई रुकवा दी.

न्यू हारलेम के आख़िरी रहस्यों को सुलझाने के लिए वहां एक अस्थायी बांध बनाकर पूरे इलाके के पानी को निकालना ज़रूरी था. वर्ज़ ने इसके लिए फ़ंड का इंतजाम कर लिया है.

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19 तोप और 4 लंगर

वह अब अंतिम सबूत के तौर पर लोहे की 19 तोपें और 4 लंगर की खोज कर रहे हैं, जिसे डच नाविक छोड़ गए थे. इसमें अभी और वक़्त लग सकता है.

वह मेटलर्जिकल रिपोर्ट का इंतज़ार कर रहे हैं और उनको उम्मीद है कि और सबूत मिलने पर ज़ल्द ही एक स्मारक बनेगा.

फिलहाल, आगंतुकों को होटल में ही अपनी गाड़ी पार्क करनी होती है और तट के साथ करीब 10 मिनट पैदल चलकर उस जगह पहुंचना होता है जहां जहाज का मलबा होने का अनुमान है.

वर्ज़ कहते हैं, "तोपें और लंगर मिलेंगे तो उनको संभालने के लिए यहां एक संग्रहालय की ज़रूरत होगी."

"मुझे पता है कि दुनिया में ऐसा दूसरा कोई जहाज का मलबा नहीं है जिसने पूरे देश पर इतना प्रभाव छोड़ा है."

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