मुंबई के पारसियों को इस मछली से इतना प्यार क्यों है?

  • मेहर मिर्ज़ा
  • बीबीसी ट्रैवल
मछली

इमेज स्रोत, Meher Mirza

जब मैं छोटी थी तो बॉम्बे में सबसे ज़्यादा जून महीने का इंतज़ार करती थी. झुलसाने वाली गर्मी के बाद इस महीने में मॉनसून के बादल आते थे, बिजली चमकती थी और गर्मी दूर भागती थी.

यही वह समय होता था जब मैं नई किताबों पर नई जिल्द चढ़ाकर दोबारा स्कूल जाती थी.

इन सबसे बढ़कर, इसी महीने में मुझ जैसे पारसियों के घर की रसोई में बॉम्बे डक आती थी. मॉनसून के महीने में ही यह सबसे ज़्यादा मिलती है और इसे पकड़ना आसान होता है.

लेकिन पारसी कौन हैं? और बॉम्बे डक क्या है? पारसी ईरान के ज़ोरोस्ट्रियन प्रवासी हैं, जो 8वीं सदी से भारत में रह रहे हैं.

ईरान के प्रवासी

19वीं सदी के उपनिवेश काल में बॉम्बे में वे ख़ूब फले-फूले. पारसी उद्यमियों ने अंग्रेजों की शोहबत में पश्चिमी शिक्षा और संवेदनाओं को अपनाया और भारतीय उद्योग और राजनीति में बड़े ओहदे हासिल किए.

वे वाणिज्य-व्यापार की अहम शख्सियत बने और अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके गरीबों के लिए स्कूल, कॉलेज और अस्पताल बनवाए.

19वीं सदी में बॉम्बे में ज़ोरोस्ट्रियन प्रवासियों की संख्या बढ़ी. ये चतुर उद्यमी ईरानी थे, जिन्होंने बॉम्बे में ईरानी कैफ़े खोले, जहां पारंपरिक रूप से सभी जातियों, धर्मों और लिंग के लोगों को खाना खिलाया जाता है.

इमेज स्रोत, Meher Mirza

भारत की तरह पारसी व्यंजनों पर उन सभी संस्कृतियों का प्रभाव पड़ा जिन्होंने इस उपमहाद्वीप में अपनी छाप छोड़ी है.

इनका मूल संभवतः इस्लाम से पहले के ईरान में है, लेकिन इस पर गुजरात, गोवा और कोंकण तटों का भी असर है. ब्रिटेन और यहां तक कि नीदरलैंड ने भी इस पर प्रभाव छोड़ा है.

भारतीय समुद्र तटों, ख़ासकर गुजरात के तटीय इलाकों की पारसी बस्तियों ने मछली को पारसी संस्कृति से जोड़ दिया है.

हम अन्य मछलियों के साथ छामनो (पॉम्फ्रेट), बोई (मुलेट), कोल्मी (झींगा), लेवटी (मड हॉपर), भींग (शाद), रवास (भारतीय सालमन) और बांगड़ा (मैकेरेल) खाते हैं. और फिर बॉम्बे डक है.

बत्तख नहीं, मछली

बॉम्बे डक असल में एक मछली है जो मुंबई और आसपास के समुद्र में मिलती है. गुलाबी जिलेटिन जैसी इस बदसूरत मछली को यह नाम कैसे मिला, यह रहस्य है.

मराठी में इस मछली को बॉम्बिल कहा जाता है. अंग्रेज इसे बोलने के लिए अपनी जीभ को महाराष्ट्र के लोगों की तरह नहीं घुमा पाते होंगे. ऐसे में संभव है उन्होंने इसके नाम का अंग्रेजीकरण किया हो.

मराठी मछली बाजारों में इसे बेचने के लिए दुकानदार "बॉम्बिलतक" (बॉम्बिल यहां है) बोलते थे. हो सकता है कि उसका अंग्रेजीकरण किया गया हो.

भारत में जन्मे ब्रिटिश-पारसी लेखक फ़ारूक धोंडी ने अपनी किताब "बॉम्बे डक" में एक और वजह बताई है.

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन,

ब्रिटेनिया एंड कंपनी रेस्तरां

उनका मानना है कि यह नाम ब्रिटेश मेल ट्रेनों से आया जो सूखी बॉम्बिल को मुंबई से देश के दूसरे शहरों तक ले जाती थीं. ट्रेन की बोगियों को "बॉम्बे डाक" कहा जाता था (डाक का मतलब होता है मेल).

इस मछली के लिए मुंबई की विभिन्न संस्कृतियों का प्यार बहुत गहराई तक है. मुंबई के मूल वासियों में से एक, कोली मछुआरे सदियों से इसे नमक लगाकर धूप में सुखाते रहे हैं.

वे इसके लिए बांस की कमानियों से बने बड़े-बड़े रैक का इस्तेमाल करते हैं जिनको वलैंडिस कहा जाता है.

सूखी मछलियों से तेज़ बदबू आती है. इसीलिए अंग्रेजों ने इसे सेहत के लिए नुकसानदेह समझा था, मगर बाद में वे इसे पसंद करने लगे.

कैसे पकाएं कैसे खाएं?

इन सूखी मछलियों को मॉनसून के दिनों में खाया जाता है. इसे करी में पकाया जाता है या फ्राई करके दाल-चावल के साथ खाया जाता है.

कोली मछुआरे इसे ताज़ा भी खाते हैं. वे इसे तीखे कोली मसाले में लपेटकर तैयार करते हैं या आधी सूखी मछली (बम्बुक बॉम्बिल) को नारियल की ग्रेवी में पकाते हैं.

भारत के पश्चिमी कोंकण तट पर सीफ़ूड पसंद करने वाले ज़्यादातर समुदायों (जैसे पूर्वी भारतीय और मराठी) के खाने में बॉम्बे डक शामिल है.

इमेज स्रोत, Getty Images

पूर्वी भारतीय इसे सिरके की चटनी में डालकर तलते हैं. इसे छोटी झींगा मछलियों के साथ भी पकाया जाता है.

महाराष्ट्र के कुछ समुदाय इसे भाजी की तरह तलते हैं. दूसरे समुदाय सूखी मछली को हरी सब्जी के साथ मिलाकर प्याज इमली के मसाले के साथ पकाते हैं.

इतना तो साफ है कि बॉम्बे डक का संबंध सिर्फ़ पारसियों से नहीं है, लेकिन हमारे घरों में इसकी ख़ास जगह है.

इसने हमारी थाली तक और हमारे गीतों तक में जगह बनाई है. हमारी किताबों में और हमारे नामों में भी इसका असर है. बूमला (बॉम्बे डक के लिए पारसी शब्द) पारसियों में एक प्रचलित सरनेम है.

दादी वाला जायका

मेरे पिता का बचपन मुंबई से 215 किलोमीटर उत्तर में गुजरात के एक छोटे से शहर बिलिमोरा में बीता था.

वह बताते थे कि मेरी दादी चारकोल की आग में सूखी बॉम्बे डक को तब तक भूनती थीं जब तक वह टूटने न लगे.

आग में भूनी हुई सूखी बॉम्बे डक मेरे सपनों में बसती है. मुंबई में किचन स्टोव पर भूनी मछली में धुएं वाला वह जायका नहीं आ सकता.

संयोग से, सूखी बॉम्बे डक की अपनी भूख मिटाने के लिए मेरे पास दूसरे तरीके हैं, जैसे कि तारापुरी पैटियो (अचार).

इमेज स्रोत, Getty Images

बॉम्बे डक के इस मसालेदार अचार का एक चम्मच ही दाल और चावल का जायका बढ़ाने के लिए काफी है.

तारी मा सुक्खा बूमला बॉम्बे डक का स्टू है जिसे ताड़ी (ताड़ के पेड़ से निकला मादक पेय), गुड़, सिरका और सूखी लाल मिर्च से तैयार किया जाता है.

ताज़ी बॉम्बे डक से ग्रेवी वाला पैटियो (अचार) भी बनाया जाता है. कभी-कभी उसे नमकीन खारा बूमला के रूप में खाया जाता है. इसे पीली क्रीमी ग्रेवी में प्याज के साथ परोसा जाता है और चावल के साथ खाया जाता है.

मुझे सबसे ज़्यादा पसंद है- नींबू और हल्दी में लिपटी हुई फ्राई करने के लिए तैयार ताज़ी मछली. इसे सूजी में लपेटकर गर्म तेल में ब्राउन होने तक तला जाता है.

इस तरह तैयार की हुई बॉम्बे डक आम तौर पर चोखा नी रोटली (चावल के आटे की रोटी) और गोर केरी नू अचार (आम का खट्टा-मीठा अचार) के साथ नाश्ते पर खाई जाती है.

भूख ज़्यादा लगी तो मटन कीमा, अकुरी (अंडा भुर्जी का पारसी रूप) या ग्रिडल पर तली हुई लेवटी (मड स्किपर्स) खाई जाती है.

ईरानी कैफ़े

इस विशेष शैली में बॉम्बे डक को चखने के लिए आपको किसी पारसी घर से खाने की दावत मिलनी चाहिए या फिर पुराने क्लब जैसे कि मुंबई का मशहूर पीवीएम (प्रिंसेस विक्टोरिया एंड मैरी) जाना चाहिए या फिर मशहूर ईरानी कैफ़े ब्रिटानिया एंड कंपनी रेस्तरां जाइए.

1923 में बने पीवीएम रेस्तरां के बड़े डाइनिंग हॉल में महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय और महात्मा गांधी की फ्रेम की हुई तस्वीरें लगी हैं.

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन,

ब्रिटेन के राज परिवार की तस्वीरें दिखाते हुए बोमन कोहिनूर

यह मुंबई की इकलौती ऐसी जगह है जहां पारसी स्टाइल वाली बॉम्बे डक खाने के लिए न्योते की ज़रूरत नहीं है.

यहां इसे सूजी में लपेटकर बाहर से खस्ता होने तक फ्राई किया जाता है जबकि अंदर का मांस मुलायम रहता है. मुंबई के गैर-पारसी सीफ़ूड रेस्तरां में इसे कांटा निकालकर कुरकुरा होने तक तला जाता है.

इस रेस्तरां के ग्राहकों को कई दशकों तक यहां के पारसी मालिक बोमन कोहिनूर से मिलने का मौका भी मिलता था.

वह भारत में ख़ुद को ब्रिटिश शाही परिवार का सबसे बड़ा प्रशंसक कहते थे. रेस्तरां में विलियम और केट की एक बड़ी तस्वीर भी टंगी है.

हाल में 97 साल की उम्र में निधन से पहले तक कोहिनूर अक्सर मुझसे कहते थे कि मैं डचेस ऑफ़ कैंब्रिज की तरह दिखती हूं (जबकि ऐसा नहीं है).

मछली से प्यार

बॉम्बे डक के लिए पारसियों का प्यार सदियों पुराना है. 1795 में एक पारसी व्यापारी सेठ कवासजी ने बॉम्बे के गवर्नर को 500 किलो सूखी बॉम्बे डक और 30 सूखी पॉम्फ्रेट मछली भेंट में दी थी.

नौरोजी फ्रैमजी ने 1883 की रेसिपी बुक में इसे "बॉम्ब्लोइस" कहा है और इस बनाने के दो नुस्खे भी बताए हैं.

एक, सूखी मछली को इमली, अदरक-लहसुन, मिर्च औऱ भूनी हुई प्याज के साथ स्टू बनाना और दूसरा, सूखी बॉम्ब्लोइस को चिली फ्राई करके उसे हल्दी, धनिया, इमली के गूदे और हरी मिर्च के साथ पकाना.

1975 में पारसी संगीतकार मीना कावा ने इस मछली के प्रति समुदाय के प्यार को एक गाने का रूप दिया था.

बॉम्बे डक नाम से मशहूर इस गाने के बोल थे- "हेयर इज़ ए स्टोरी सिंपल / ऑफ़ ए डक विद ए लिटिल डिंपल / ही इज़ दि स्ट्रेंजेस्ट लिटिल डक / दिस लिटिल डकी नेवल क्लक्स."

संस्कृतियों का बोझ अक्सर रसोई उठाती है. भोजन किसी इंसान की असली पहचान बताती है.

इमेज स्रोत, Getty Images

पारसी खाने को ध्यान से देखें तो क्या पता चलता है? हमारा दुनिया भर में घूमना. गिरगिट की तरह हमारा अनुकूलन और आत्मसात करने की प्रवृत्ति? हमारी विलक्षणता? आखिर, एक बदसूरत मछली के पीछे कौन अपना नाम रखता है?

या शायद यह सब कुछ मायने रखता है. हर साल जब शहर की गर्मी मॉनसून के बादलों के लिए जगह बनाती है, मेरी बेचैनी कम हो जाती है. मुझे वे दिन याद आते हैं जब छोटी लड़की थी तब बॉम्बिल से भरे प्लेट पर डोलती रहती थी.

(बीबीसी ट्रैवल पर इस स्टोरी को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. आप बीबीसी ट्रैवल को फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)